Thursday, May 28, 2020
अनाज की खेती गेहू की खेती व उत्पादन  के बारे में  के  जानकारी

भारतीय किसान वेब समाचार पत्रिका में आप सभी किसान साथियों का बहुत बहुत स्वागत है। किसान साथियों को सभी प्रकार की खेती के बारे में जानकारी देना तथा खाद्य आपूर्ति- खाद्य प्रंस्करण के बारे में बताना जिस से किसान को अपनी फसल का उचित उत्पादन तथा उचित मूल्य मिल सके ।

अनाज की खेती

1.गेहूं
गेहू भारत वर्ष में रहने वाली 60 प्रतिशत जनसंख्या के भोजन के काम में आता । इसके दाने को हाथ की चक्की या चक्की से पीस कर आटा तैयार करते हैं । जिससे चपाती , पूड़ी आदि बनाकर खाने के काम में लिया जाता है । इसको ज्यादा बारीक पीसकर मैदा तैयार की जाती है । जिससे मिठाई आदि व नमकीन बनाने के काम लिया जाता है । प्राय : गेहूं से रोटी , पुर – पुए कई मिठाईयां बनाई जाती हैं । इसके दाने के रंग से ही गेहूंआ रंग कहा जाता है । इस गेहू पर एक लम्बी लाईन होती है तथा बीच का हिस्सा मोटा होता है । आजादी से पूर्व हमारे देश में गेहूं धनाढ्य लोगों के भोजन में ही काम आता था क्योंकि यहां के कृषक इसकी खेती कम करते थे । कारण उपज कम होती थी ।

गेहू के दाने
  1. मिट्टी : – गेहूं के लिए दोमट मिट्टी अच्छी रहती है । इसमें गेहूं की पैदावार अच्छी होती है । बालू मिट्टी में इसकी पैदावार कम होती है । नदियों द्वारा बहाकर लाई गई मिट्टी या नदियों के मुहाने पर गेहूं का उत्पादन ज्यादा होता है । इसके लिए मुख्य रूप से काली दोमट मिट्टी अधिक अच्छी रहती है ।
    2 खाद : – गेहूं उत्पादन के लिए खाद की आवश्यकता ज्यादा होती है । अत : गोबर की खाद इसके लिए ज्यादा लाभकर होती है । इसके लिए 1200 किलो या गोबर की खाद ( प्रति बीघा के हिसाब से होनी चाहिए ) । गोबर की खाद गड्ढों में सड़ाकर कम्पोस्ट खाद जाती है । तैयार कर लेते हैं । यह खाद गेहूं के लिए 400 किलो प्रति बीघा के हिसाब से जमीन में डाली
  2. पानी : – गेहूं उगने के 20 से 25 दिन के अंदर पानी दिया जाता है । उस समय इसकी जड़े फूटना शुरू हो जाती है । इसके बाद 15 दिन के अन्तराल में पानी दिया जाता है । बाली आने पर 7 से 10 दिन तक के समय में पानी दिया जाता है । लेकिन जहां खारा पानी है वहां पफते समय पानी देनी चाहिए क्योंकि अधिक खारा पानी देने से गेहूं का दाना कमजोर होगा तथा उसका रंग फीका पड़ जायेगा । इससे बाजार भाव कम मिलेगा ।
    बुगाई का समय : – गेहू की बुवाई अक्टूबर से 30 नवम्बर तक की जाती है । तया आधूनिक किस्म के बीज 15-20 दिसम्बर तक बोये जाते हैं । जब तापमान 10 डिग्री तक आ जाये तो गेहूं की बुआई चालू हो जाती है । ज्यादा सर्दी पड़ने पर गेहूँ कुछ समय बाद निकलता है , कम अंकुरित होता है ।
    निराईगुड़ाई : – गेहूं के लिए खरपतवार हटाना अति आवश्यक है । हमारी भूमि में खरपतवार अधिक होते हैं , उसकी वजह से गेहूं की फसल कमजोर हो जाती है । खरपतवार हटाने से इसके फूट ( टहनियां ) ज्यादा होती है । जिससे पैदावार अधिक होती है । अत : गेहूं में पहला पानी देकर निराई गुड़ाई कर देनी चाहिए । निराई गुडाई खुरपी से ज्यादा अच्छी रहती है ।
  3. कटाई – छंटाई : – गेहूं की कटाई हमारे यहाँ प्राय : मार्च के आखिरी सप्ताह से अप्रैल के पहले सप्ताह में पूरी हो जाती है । हमारे यहां कटाई खेतीहर मजदूर द्धारा हाथ से की जाती है । जहा लम्बी खेती है वहां मशीनों द्वारा कटाई की जाती है ।
  4. गेहू से चारेको अलग निकालना : – प्राय : पहले गेहूं को चारे से अलग फरने के लिए पशुओं को काम में लिया जाता था । उनको गेहूं पर घुमाकर गेहूं अलग निकाला जाता था , लेकिन आज के मशीनीकरण के समय प्रेशर से गेहूं निकाला जाता है ।
  5. शेष अवशेषों का उपयोग : – गेहूं निकालने के बाद शेष चारा बचता है , जो हमारे पशुओं को चराने के काम में आता है , क्योंकि खेती में पशु किसान से आगे रहते है , किसान पीछे । अत : प्रकृति में पहले चरने वाले के लिए चारा , बाद में चलने वाला के लिए अनाज आदि दिया है ।
  6. उत्पादन : – गेहूं का उत्पादन 70 से 80 किन्टल प्रति हेक्टयर होता है । हमारे यहां इसको बहुत अच्छा उत्पादन मानते हैं । प्राय : 40 से 50 किन्टल प्रति हेक्टयर तक ही गेहूं उत्पादन होता है ।
  7. बाजार भाव : – गेहूं का भाव प्रतिवर्ष बढ़ता ही जा रहा है । इस समय 2000 से 2400 रूपये के हिसाब से गेहूं का बाजार भाव है । जैविक खाद से तैयार गेहूं 4000 / – प्रति किन्टल तफ बिकते हैं । लाभा- गेहूं के चोने पर किसान को 25 से 30 हजार रूपये प्रति हैक्टर से व अधिक अधिक 40 – 50 हजार रूपये के हिसाब से आमदनी होती है ।
  8. आयात :- हमारे देश में कृषि प्राय : वर्षा पर निर्भर होती है ,
  9. जिस वर्ष वर्षा कम होती
    जल स्रोत सूख जाते हैं , पानी की कमी होने से हमारा उत्पादन कम होता है । हमारे यहां पानी की कमी से कम उत्पादन होने पर गेहूं कम पैदा होती । जनसंख्या अधिक होने पर गेहूं का बाहर देशों से आयात होता है । लेकिन कुछ वर्षों में आयात नहीं हो रहा है ।
  10. निर्यात : – आज हमारा देश खाद्यान में आत्म निर्भर है । हमारे यहाँ ज्यादा गेहूं का उत्पादन होने के कारण गेहूं का निर्यात किया जाता है , जिससे विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है । जो हमारे देश की आर्थिक स्थिति को ज्यादा मजबूत करती है ।
  11. भण्डारण व्यवस्था : – प्रायः सभी उत्पादन को सुरक्षित रखने के लिए भण्डारण की व्यवस्था की आवश्यकता होती है । जिससे हमारा उत्पादन खराब नहीं हो । परम्परागत तरीके से हमारे देश में पहले गेहूं को सुरक्षित रखने के लिए अच्छी व्यवस्था नहीं थी । जिससे हमारा गेहूं उत्पादन का अधिक भाग खराब हो जाता था और उन्हें चूहे खा जाते थे जो खाने के योग्य नहीं था । लेकिन अब भारत सरकार के खाद्यान विभाग द्वारा किसानों के लिए अच्छी किस्म के अनाज भण्डारों की व्यवस्था की गई है जिससे अनाज खराब नहीं होता है तथा किसान भी पढ़े – लिखे होने के कारण अनाज को भूसे के अन्दर बोरियों में भरकर रख देते हैं । जिससे नमी नहीं मिलने के कारण सुक्ष्म कीटाणु से होने वाले रोग तथा चूहों द्वारा होने वाले नुकसान से बचाया जाता है । यानी कि लम्बे समय तक ये अनाज खराब नहीं होता । कई परिवार , जहां पूरे परिवार के लिए साल भर तक गेहूं रखना जरूरी है ।
  12. कीटों से बचाने के लिए उन पर 100 ग्राम प्रति क्विंटल के हिसाब से इंडोली [अरंडी] का तेल लगाकर छाया में रख देते हैं । इसके लगाने से गेहूं में किसी भी प्रकार के फिटाणुओं का प्रकोप नहीं होता व लम्बे समय तक गेहूं ठहर जाता है।
  13. सावधानिया : – ज्यादा मात्रा में इन्डोली [अरंडी ] के तेल का लेप न करें इससे छोटे बच्चों को दस्त होने का भय रहता है । इस प्रकार गेहूं को बचाया जा सकता है । सल्फास रखने से घर में कई प्रकार की घटनाएं घट सकती है । हमारे परम्परागत तरीके ही बेहतर है ।
    भारतीय किसान वेब पत्रिका का प्रमुख काम जैविक खेती को बढ़ावा देना है । अतः सभी किसान भाईयो से निवेदन हे जैविक खेती की ओर बढ़े और अपनी लागत कम करे । आने वाला समय जैविक का ही है ।
    भारती किसान पत्रिका पर बने रहने के लिए आभार ऐसी जानकारी के लिए बने रहे भारती किसान के साथ नोतीफैक्शन ओन कर सब से पहले जानकारी ले उन्नत किसान बने ।
    जय हिन्द जय भारत ।

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