Thursday, May 28, 2020
जैविक खेती किसे कहते है

जैविक खेती किसे कहते है और का महत्व

भारतीय किसान में आप का स्वागत है। आज फिर हम नए दिन के साथ नई जानकारी के साथ हाजिर हैं आपकी सेवा में हमारा लक्ष्य समृद्ध किसान स्वस्थ किसान । यह जब ही संभव हो पाएगा जब किसान की आय बढ़ेगी ऑर्गेनिक फार्मिंग अर्थात जैविक खेती की एक माध्यम है इसके सिवा दूसरा कोई और रास्ता नहीं है।

जैविक खेती किसे कहते है

जैविक खेती –

जैविक खेती भारतवर्ष की सनातन प्राचीनतम कृषि उत्पादन पद्धति रही है । अपि पाराशर ने बताया – ” जन्तुनाम जीवनम कृषि ” अर्थात् कृषि का आधार भूमि में रहने वाले सूक्ष्म जीवाणु है । जैविक खेती जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है जीवों के सहारे की जाने वाली जीवन्त खेती है । इसमें जीवो को प्राप्त होने वाले पदार्थों का अधिकतम व उचित उपयोग किया जाता है । ” जैविक खेती एक सम्पूर्ण कृषि कार्यशाला है , जिससे पर्यावरण को शुद्ध रखते हुए प्राकृतिक संतुलन को कायम रखकर भूमि , जल व वाय को प्रदषित किये बिना दीर्घ अवधि तक टिकाऊ उत्पादन प्राप्त किया जाता है । इस पद्धति में जीवांश तथा प्रकृति प्रदत्त संसाधनों एवं कार्बनिक अवशिष्टों का उपयोग किया जाता है , जिससे उत्पादन व्यय कम करके अधिक से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सके । जैविक खेती , विविधिकृत खेती की एक विशेष पद्धति है जिसमें अप्राकृतिक , संश्लेषित तथा प्रदूषणकारी पदार्थों या आदानों का उपयोग निषेध है । यह पद्धति स्वफार्म उत्पादित आयानों तथा प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं के सम्पूर्ण उपयोग पर आधारित है । जैविक खेती हमारी फसलों से प्राप्त पदार्थों से की जाती है , जिसमें हम कृत्रिम वादों , रासायनिक उर्वरकों , कीटनाशी व फफूंदनाशी रसायनों आदि का प्रयोग नहीं करते है । जैविक खेती मुख्यतयाः फसल चक्र , फसल अवशेष , जीवांश वाद , दलहनी फसल , हरी खाद , खनिज पदार्थों एवं जैविक कीट व व्याधि नियंत्रण पर निर्भर करती है , जो मृया की उत्पादकता बनाये रखते है , तथा जीवांस यादों व अन्य प्राकृतिक पोषक प्रदार्तो द्वारा पौधों को पोषक तत्वों की आपूर्ति की जाती है । फसलों में कीटों एवं व्याधियों का नियंत्रण जैविक उपायों से किया जाता है । जैविक खेती में मृदा एवं जल का प्रबन्धन इस प्रकार किया जाता है जिससे प्रकृति द्वारा प्रदत्त अनमोल सम्पदा को भविष्य की धरोहर के रूप में संरक्षित किया जा सके ।

उद्देश्य – जैविक खेती के मुख्य उद्देश्य निम्न प्रकार है :

( 1 ) एक ऐसी जीवन धारण करने वाली कृषि प्रणाली का विकास करना जिससे भविष्य में अधिक मात्रा में पोषक खाधान का उत्पादन हो सके ।

( 2 ) हमारे अपने संसाधनों में से उपलब्ध सस्ते संसाधनों पर आधारित आत्मनिर्भर । कृषि प्रणाली विकसित करना ।

 ( 3 ) रासायनिक खेती के विकल्प के रूप में जैविक खेती को प्रोत्साहन देकर जल , मिट्टी व पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त रखना । कर कृषकों को स्वावलम्बी बनाना ।

उत्पादन लागत में कमी लाकर टिकाऊ खेती के तरीकों के विकास द्वारा खेती विशेषताएं –

जैविक खेती की मुख्य विशेषताएँ निम्नानुसार है:

 ( 1) जैविक खेती में फार्म को एक जीवित संगठन के रूप में माना जाता है । खेत , पशु, उधान , मित्र कीट , जीवाणु , औषधीय फसलें , मनुष्य आदि इसके महत्वपूर्ण अंश । सभी घटकों के बीच संतुलन बना रहता है । एक घटक का अपशिष्ट दूसरे घटक के लिए आदान के रूप में काम में आता है ।

 ( 2 ) जैविक खेती दीर्घ अवधि तक मृदा में जैविक स्तर बनाये रखती है जिससे मृदा काफी उपजाऊ बनी रहती है ।

 (3) जेविक खेती पदति तीन मुख्य उद्देश्यों , यथा – पर्यावरण सुरक्षा , आर्थिक समृद्धि और सामाजिक आर्थिक समता का संयोजन करती है ।

(4) जैविक खती उत्पाद के व्यावसायीकरण के लिये जैविक होने की मान्यता होना आवश्यक है जो जैविक उत्पाद प्रमाणीकरण के पश्चात् मिलती है ।

( 5 ) जैविक खेती में मृदा में मौजूद सूक्ष्म जीवों के द्वारा पौधों को पोषक तत्व उपलव्य करवाया जाता है ।

( 6 ) जैविक खेती में दलहनी फसलों का प्रयोग करने से नाइट्रोजन का जैविक स्थिरीकरण होता है जिससे मृदा नाइट्रोजन के मामले में आत्मनिर्भर बनती है । साथ ही फसल अवशेष , जीवांश वाद , हरी खाद आदि के कारण मृदा में अन्य आवश्यक मुख्य व सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति होती है ।

(7 ) खरपतवारों , व्याधियों तथा कीटों का नियंत्रण मुख्य रूप से फसल चक्र , कीटों के प्राकृतिक शत्रुओं , जैव मित्रता , प्रतिरोधी किस्मों आदि पर निर्भर करता है । ( 8 ) इस प्रणाली से उत्पादन लागत कम की जा सकती है और उत्पाद की गुणवत्ता में वृद्धि की जा सकती है । भारत में जैविक खेती का महत्त्व – भारत में जैविक खेती के प्रोत्साहन के लिए भारत सरकार का विशेष प्रयास है ।

भारत में जैविक खेती का महत्त्व निम्न कारणों से है :

(1 ) हरित क्रान्ति की सूत्रधार फसलों जैसे गेहूँ – पान के अधिकतम उत्पादन के लिये अपनाई गई रासायनिक पद्धति के दुष्परिणाम हाल ही के कुछ वर्षों में दृष्टिगत होने लगे हैं । इन फसलों के अधिकतम उत्पादन के कारण हमारे जल संसाधनों एवं भूनि का अन्धाधुंध दोहन आ जिस कारण भूमिगत जल स्तर में काफी गिरावट आई तथा मृदा की उर्वरा शक्ति में काफी कमी आई । लगातार एक ही फसल पक अपनाने के कारण भूमि और पोधो में कुछ विशेष तत्त्वा , जसे – गन्धक , लोहा , ताँबा , मैंगनीज , जस्ता आदि की कमी होने लगती है।

(2 ) दीर्घावधि उर्वरक प्रयोग के परिणाम भी यह दर्शाते है कि बिना जीयांश खाय व कार्बनिक पदार्थों के उपयोग न केवल उर्वरकों के आधार पर फसल की अधिकतम उपज । का लगाटार बनाए रखना सम्भव नहीं है । हमारे देश में मुख्य पोषक तत्वों की माग व खपत में 8 मिलियन टन का अन्तर है । यदि वर्तमान स्तर तक खड्यान उत्पादन बनाए रखना है तो पोषण तत्वों के वैकतिपक स्त्रोतों पर विचार करना का होगा ।

( 3)कृषि निर्यात की सम्भावनाओं तथा डब्लयू . टी . ओ . व्यापार नीति के चलते हमें गेहूं धान मसाले .फल आदि निर्यात के लिए इन फसलों की अच्छी मांग वाली किस्मों के अलावा इनकी गुणवता भी अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप रखनी होगी ।

( 4 ) बढ़ते हुए प्रतिस्पर्धा के युग में कृषि उपज को लागत प्रभावी बनाने की आवश्यकता।

भारतीय किसान वेब पोर्टल ऐसी ही जानकारी आपको निरंतर देता रहेगा अधिक जानकारी के लिए हमें कमेंट कर आप अपने समस्या का समाधान प्राप्त कर सकते हैं हमारी टीम आपको जल्द ही आपकी समस्या का समाधान करेगी ।

 धन्यवाद।
Tags: , , , , , ,

0 Comments

Leave a Comment

RECENTPOPULARTAGS