Thursday, October 22, 2020

विश्व जनसंख्या का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है । सदियों से चले आ रहे इस पेशे का ज्ञान अनवरत विकसित होता रहा है । परंपरागत पद्धतियों की जगह नई व आधुनिक तरीकों ने ले ली है चाहे वो खेती करने का तरीका हो या कटाई उपरान्त भण्डारण की प्रक्रिया । परन्तु हम यह भूल गए कि परंपरागत पद्धतियों की यह विशेषता है वे सस्ती होने के साथ – साथ , कम जोखिम वाली , कुदरती , आसान व कारगर है । समय की मांग है संधारणीय खेती । इसके चलते हमें जैविक तरीकों को अपनाना होगा और परंपरागत ज्ञान का संस्थापन कर उसे पुर्नजीवित करना होगा । भारत में अपर्याप्त भण्डारण की प्रक्रिया के कारण 10-20 प्रतिशत तक अनाज का नुकसान होता है । इससे बचने के लिए हम हानिकारक रसायनिक दवाओं का उपयोग करते है जो कि स्वास्थ्य पर प्रतिकुल प्रभाव डालने के साथ – साथ महंगे भी होते है । जरूरत है कि हम नीम की पत्तियों , निंबोली , हल्दी जैसे तरीके अपनाएं एवं सुरक्षित अनाज भण्डारण करें ।

परंपरागत विधियां

  1. हल्दी : यह रसायनिक तरीकों का एक अच्छा विकल्प है । हल्दी को 20 ग्राम प्रति किलो अनाज में हल्के हाथों से मले और छाया में ‘ आधे घण्टे तक सुखाएं । इसके पश्चात् अनाज भण्डारित करें । हल्दी में उपस्थित कीटनाशी गुणों के कारण ये अनाज को लम्बे समय तक सुरक्षित रखती है और अनाज सेवन के लिए भी उपयुक्त रहता है ।
    2 , मसालों का उपयोग : साबुत लाल मिर्च : घरेलू स्तर पर रसोई में दालें आदि कम मात्रा में डिबों में रखी जाती है । इन्हें कीटों से बचाने के लिए उन डिब्बों में दो साबुत लाल मिर्च रखें व ढक्कन बन्द कर दें । इससे दालों में दलहन धुन व ग आक्रमण नहीं करेंगे । हींग व पीसी मेथी दाना : उपरोक्त बताए तरीके के स्थान पर दाल के डिब्बों में हींग की डली अथवा सूखे मेथी दाने के पाउडर की सूती कपड़े की पोटली को भी रखा जा सकता है । लहसुन : कीटनाशी गुणों के कारण लहसुन कीड़ो को बढ़ने नहीं देता । चावल में लहसुन की कलियों की परतें बिछाकर यदि कोठी को कस कर बंद किया जाए तो लहसुन के कड़वेपन की वजह से चावल में कीड़े नहीं लगेंगे ।
  2. नमक : पुराने समय से नमक का उपयोग खाद्य उत्पादों को प्रसंस्कृत करने में किया जाता रहा है , ताकि उनमें फंफूद व कीटाणु न लगे । कीड़ों पर भी नमक का हानिकारक असर पड़ता है । नमक कीड़ों पर अपहार्षक यानि उनकी त्वचा पर खुरदरा होकर घिसता है जिससे वे अनाज पर आक्रमण नहीं कर पाते , परन्तु यह विधि अनाज को 4 से 5 माह तक ही सुरक्षित रख पाती है । नमक का ईमली भण्डारण में उपयोग ज्यादा देखा जाता है । 10 ग्राम नमक को प्रति एक किलो ईमली में उपयोग किया जाता है जिसमें ईमली का छिलका हटा कर उसकी परतें बिछाई जाती है व बीच – बीच में नमक को एक समान रूप से फैलाया जाता है । इससे मूंग , अनाज का चूरा , शल्म आदि से बचाव होता है । 4. चूना : भण्डारीत अनाज में कीट नियंत्रण के लिए यह एक सस्ता व आसानी से उपलब्ध तरीका है । इसमें चूने के पाउडर को 10 ग्राम प्रति किलो अनाज के हिसाब से अच्छी तरह मिश्रित किया जाता है । फिर उन्हें बोरी में भरकर एक सूखे स्थान पर रखा जाना सकता है । चाहिए । चूने की परेशान करने वाली गंध के कारण लम्बे समय तक कीड़ों से बचा जा राख का उपयोग : छाणे ( उपले , गोबर के कण्डे ) अथवा लकड़ी की राख के उपयोग
    5 . से अनाज को 6 महीने तक सुरक्षित किया जा सकता है । इसमें दालों या अनाज को कोठी में तीन – चौथाई तक भरकर बचे हुए एक – चौथाई हिस्से में राख की परत विधाई जाती है । 6 माह बाद अनाज को धूप में सुखाकर फिर इसी प्रक्रिया को दोबारा दोहराया जाता है । गेहूं को भण्डारित करने में भी जाणे की राख का उपयोग किया जाता है , क्योंकि इसमें कीटनाशी गुण होते है ।
  3. माचिस के डिब्बे का उपयोग : इसे भी घरेलू स्तर पर अपनाया जा सकता है । इस तरीके में माचिस के डिब्बों को कोठी अथवा डिब्बे के तले में आधा अनाज भरने के बाद बीच में , व कोठी पूरी भरने के बाद ऊपरी सतह पर पास – पास बिछाया जाता है । फिर कोठी को कस कर बंद कर दें । माचिस की तिलियों में उपस्थित फॉस्फोरस के कीट प्रतिरोधक गुण के कारण अनाज सुरक्षित रहता है ।
  4. स्वीट लेग राइजोम : इसे हिन्दी में बच और घोरबच भी कहा जाता है । धौरबच बेलनाकार , 19-25 मिलीमीटर , व्यास एवं 10 सेमी . लम्बाई वाला कंद होता है । यह बाहर से हल्का भूरा और अन्दर से सफेद व स्पंजी होता है । इसकी तीखी गंध होती है जो कीटों को दूर रखती है । भण्डारण में इसका उपयोग 1 किलो प्रति 6 किलो अनाज के हिसाब से किया जाता है ।
  5. नीम का उपयोग : अनाज भण्डारण में नीम एक अत्यंत उपयोगी पेड़ है । इस पेड़ के हर हिस्से में एजाडिरेक्टिन ‘ नामक रसायन मौजूद होता है जिसमें कीटनाशी गुण होते है । नीम की पत्तियों में इसकी अच्छी मात्रा होती परन्तु निम्बोली ( नीम का फल ) के बीज में इसकी सर्वाधिक मात्रा पायी जाती है । नीम के अर्क यानि निचोड़ के असर से कीड़े व कीट अचानक नहीं मरते बल्कि यह उनके जीवन चक्र को हानि पहुंचा कर क्रमशः उन्हें मारता है । इसके असर से कीड़े प्रजनन भी नहीं कर पाते । नीम को कई तरीकों से अनाज भण्डारण में उपयोग किया जा सकता है परंतु इनमें यह ध्यान रखने की जरूरत है कि सूरज की रोशनी के संपर्क में आने पर नीम से बने उत्पादों के कीटनाशी गुण खत्म होने लगते है । अतः उन्हें छाया में ही उपयोग में लाएँ ।

( अ ) नीम की पतियां – इनका उपयोग साफ अनाज में किया जा सकता है । वह अनाज जिनमें कीट आक्रमण हो चुका है , उनमें यह विधि उपयुक्त नहीं रहेगी । यह अनाज को पूरे एक साल तक सुरक्षित रखेगी । पहली विधि – भण्डारण पात्र के तले में पहले 1.5 सेमी चौड़ी परत नीम की पत्तियों की बिछाएं । फिर धूप में सुखाए हुए | अनाज की 1 फीट ( 30 सेमी . ) गहराई की परत विणएं । इसके | बाद दोबारा 1.5 सेमी . चौड़ी परत पत्तियों की बिछाए । पात्र भरने तक इन परतों को दोहराते जाएं । फिर अन्त में सबसे ऊपर भी नीम की पतियों की अच्छी परत बिछाएं । अब पात्र को बन्द कर दें । दूसरी विधि – नीम की ताजी पत्तियों को धूप में सुखाएं ताकि वे हरी रहें । गूखने पर उन्हें पीस कर पाउडर बना लें । अब उसमें इतनी मात्रा में मिट्टी व पानी मिलाएं जिससे यह पेस्ट बन जाए । भण्डारण पात्र में इस पेस्ट को पलस्तर करें और सूखने के लिए छोड़ दें । इसके बाद सूखी नीम की पत्तियां पात्र के तले में विणकर अनाज भरें । पूरा भरने पर अनाज के ऊपर एक और परत नीम की सूखी पत्तियों की बिछाए और पात्र का ढक्कन बंद कर दें । तीसरी विधि – अनाज को बोरियों में भरनी हो तो इस विधि को अपनाए । इसमें अनाज में सूखी नीम की पत्तियों का पाउडर सीधा मिलाया जा सकता है । इसके लिए 1-2 किलोग्राम पाउडर को 50 किलोग्राम अनाज के हिसाब से मिलाएं ।
एक ओर साधारण उपाय
निम्बोली की गुठली ( बीज ) का पाउडर : निम्बोली कर्नल नीम का फल पीले रंग का बेर जैसे आकार का होता है । इसे निम्बोली भी कहा जाता है । इस फल के पकते ही इसमें से गुठली निकाल देवे नहीं तो उस पर फफूंद लगने का खतरा रहता है । इन गुठलियों को कुछ दिन के लिए धूप में फैलाकर इसके बाद इन्हें ओखली में कूट कर इनका छिलका हटाए । इस छिलके के कचरे को सूप से पाछोरकर हटाए । बचे हुए छिलका रहित बीज ( कर्नल ) को पीस कर पाउडर बना लें । इस पाउडर को 1 किलो प्रति क्विंटल अनाज के हिसाब से मिलाएं ।
नीम के तेल के साथ भंडारण
नीम का तेल – 1 किग्रा . नीम के बीज से 100-150 मि.ग्रा , तेल निकाला जा सकता है । बीज से तेल निकालने की विधि : नीम के बीज को पीस लें और पाउडर में पानी मिलाकर उसका पेस्ट बना लें । इस पेस्ट को तब तक गूंधे ( आटा गूंधने जैसे ) जब तक सतह पर तेल की बूंदे न आ जाए । फिर मिश्रण को दृढ़ता से दबाएं ताकि और तेल निकाला जा सके । गंधने और दबाने की प्रक्रिया तब तक करे जब तक ज्यादातर तेल न निकल जाए ( बीज में तेल की मात्रा 45 प्रतिशत ) । भण्डारण से पहले साबुत दलहनों में नीम का तेल ( 20 मिली , तेल प्रति 1 कि.ग्रा . दलहन ) मिलाएं । इससे लोबिया धुन , दलहन धुन आदि से सुरक्षा मिलती है । इसमें बराबर मात्रा में अरण्डी का तेल मिलाने पर यह ज्यादा असरदार हो जाता है । इस तेल में कड़वापन होता है परन्तु इस तेल में भण्डारित दलहनों के स्वाद पर कोई असर रिपोर्ट नहीं किया गया है । इसकी तेज गंध से कीड़ों का आक्रमण नहीं होता है और यह कीड़ो को अण्डो की अवस्था में भी मारने में सक्षम है । ( द ) नीम के बीज का सत् ( नीम सीड कर्नल एक्सट्रेट ) 1 कि.ग्रा . नीम के बीज का पाउडर लेकर उसे कपड़े में बांधकर पोटली बनाएं । इस पोटली को 10 लीटर पानी में रात भर भिगोएं । अगली सुबह इस पोटली को पानी में दवाएं ताकि सारा सत पानी में पुल जाए । पोटली निकाल लें । इस घोल में बारियों को आधा घण्टा भिगोएँ । फिर बोरियों को छाया में सुखाएं । इन बोरियों का उपयोग अनाज भण्डारण में करें । सारांश : वर्षभर अनाज की उपलबता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि घरेलू स्तर पर गुरक्षित अनाज भण्डारण किया जाए । उपर प्रताप तरीको आसान , सरते , सुरक्षित , आसानी से उपलका पर्व पर्यावरण के लिए भी अनुकूल है । रसायनिक तरीकों के बजाय ये तरीके अपनाएं और अपने स्वास्थ्य व
अनाज दोनों को सुरक्षित रखे।
भारतीय किसान के साथ

आज आप ने जाना जैविक विधि से अनाज व दालो का भंडारण करना व किटो से बचाव करना ।
खेती किसानी व जैविक खेती से संबंधित जानकारी के लिए बने रहिए भारतीय किसान के सात ।
जब किसान अपनी खेती में लागत कम नहीं करता तब तक किसान के लिए खेती फायदे का सौदा नहीं हो पाएगा । जैविक खेती ही एक मात्र रास्ता है । जैविक खेती के पद पर आगे बढ़े भारत ओर अधिक से अधिक उत्पादन करे साथ में निर्यात में अपने देश का नाम बड़ाए जिस से देश में बाहर से मुद्रा आएगी तो देश का रुपया मजबूत होगा।
जय हिन्द जय भारत ।
भारतीय किसान

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