Sunday, July 5, 2020

जो खाने से इतना फ़ायदा होगा किसीने सोचा भी नहीं होगा जाने जो के बारे में

भारतीय किसान पर आप सब किसान साथियों अभिनन्दन है।
आज हम आप के लिए लाए है जो को फसल के बारे में जानकारी और जो के होने वाले उपयोग के बारे में बताएंगे
इंफ्लामेटरी गुण होते हैं। लेकिन जौ घास के साथ ही जौ का नियमित सेवन करना आपको कैंसर के लक्षणों से बचा सकता है।
जौ के साबुत अनाज में फाइटोकेमिकल्‍स सामग्री जैसे फोलेट, फ्लेवोनाइड्स और लिग्नन्‍स होते हैं
जो कैंसर की संभावनाओं को कम करते हैं। इसके अलावा कुछ अध्‍ययन भी पुष्टि करते हैं कि जौ में एंटी-कार्सिनोजेनिक गुण होते हैं
जो कई प्रकार के कैंसरों का इलाज करने में मदद करते हैं। आप भी कैंसर के लक्षणों को कम करने या भविष्‍य में
कैंसर के प्रभाव से बचने के लिए जौ का इस्‍तेमाल कर सकते हैं | जो के दानो को उगाकर 4 – 5 तक की घास के रूप में तैयार कर के उस घास का जुष बनाकर उपयोग में लेते है | काफी फायदे मंद होता हे रोटी बनाकर भी खाते हे जिस से इम्यूनिसिस्टम डेवलप होता है |
खाने के फायदे उच्‍च रक्‍तचाप, गठिया, अस्‍थमा, नपुंसकता, त्‍वचा समस्‍याओं और हृदय रोगों को दूर करने के लिए कर सकते हैं।

jo barli ke benifits or khati

जो ( बरली )

  • जो का पौधा गेहूं से बहुल मिलता – जुलता होता है । इसकी खेती संसार के सभी भागों में होती है ।
  • इसमें सोलोषण सहने की शक्ति ज्यादा होती है । समुद्र तल से 1600 फिट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती होती है ।
  • 1 . मिट्टी : – इसके लिए काली दोमट मिट्टी अधिक उपयुफत रहती है । पैसे हर प्रकार की जमीन में इसे उगाया जा सकता है ।
  • परन्तु पैदावार अधिक नहीं होती तथा खर्चा एक सा पशु आहार में काम आता है । होता है , जिससे किसान को अधिक मुनाफा नहीं होता ।
  • खाने के अलावा बीयर बनाने
  • 2 . खादः- इसके लिए 60 विटंल गोबर की सड़ी हुई खाद प्रति हैक्टर के हिसाब से देनी चाहिए , कम्पोस्ट खाद उपरोक्त का 1/6 भाग होने
  • पर भी काफी होता है । जौ की फसल में देंचा , ग्वार खाद आदि की हरी खाद भी उपयुक्त रहती है । पानी : -जौ के बोने के 20 से 25 दिन तक
  • पानी देना आवश्यक होता है । उस समय उसकी जड़ों में फुटान होती है तथा दूसरा पानी खरपतवार निकालने के बाद , 5-6 पानी देने पर
  • जौ की पैदावार अच्छी होती है । पकते समय जौ में एक पानी कम कर दें । ज्यादा पानी देने से दाना बारीक बनता है ।
  • जुआई का समय : – जौ की बुआई गेहूं से पहले की जाती है । इसकी बुआई 15 अक्टूबर से पहले हो जानी चाहिए ।
  • जहां सिंचाई के साधन व पानी की मात्रा अधिक होती है तथा वातावरण ठण्डा होता है , इसकी अगली खेती करते हैं ।
  • निराई – गुड़ाई : –
  • जौ की निराई , गुड़ाई गेहूं की तरह ही की जाती है । पहला पानी देने के बाद खरपतवार निकाल दी जाती है ।
  • जिससे फुटान अच्छी होती है तथा उत्पादन भी ज्यादा होता है ।
  • कटाई : – जौ की कटाई प्राय : होली के पास मार्च माह में गेहूं से पहले होती है , इसकी कटाई हाथ दातली से की जाती है ।
  • आज – कल मशीनों की सहायता भी ली जाती है ।
  • जौ को अलग निकालना : – गेहूं की तरह ही जौ को पहले जानवरों द्वारा घुमाकर निकाला जाता था । अब मशीनीकरण होने से मशीनों से निकाला जाता है ।
  • शेष अवशेषों का प्रयोग : – जौ को अलग निकालने के बाद शेष चारा जानवरों के काम आता है । अगेता चारा मिलने पर पैसे भी ज्यादा मिलते हैं ।
  • उत्पादन : – जौ का उत्पादन 60 से 70 क्विटंल प्रति हैक्टर के हिसाब से होता है ।
  • जहां अच्छा खाद , समय पर पानी व दुमट मिट्टी होती है अधिकतम उत्पादन 70 से 80 किटंल होता है ।
  • निर्यात : – जौ का निर्यात किया जाता है ; जौ बीयर बनाने , पशु आहार व खाने के काम आता है ।
  • भण्डारण व्यवस्था : – जौ को निकालकर रखना है तो इसको जौ के भूसे में दबा दें जिससे हवा पास न हो ।

इस प्रकार जौ के जानवर , कीट नहीं लगेगा तथा लम्बे समय तक खराब नहीं होता है।

अरंडी या इंडोली का तेल उपयोग भंडारण में करे तो जो खराब नहीं होगा कीटाणु नहीं लगेगा।

ऑर्गेनिक फार्मिंग खेती में भंडारण करने का सब से अच्छा तरीका है।

भारतीय किसान पत्रिका पर बने रहने के लिए आप सभी किसान साथियों बहुत बहुत धन्यवाद

भारतीय किसान फिर हाज़िर होगा खेती किसानी की ऐसी ही जानकारी के साथ

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