Tuesday, September 29, 2020
कपास की खेती की संपूर्ण जानकारी देशी व बिटी कपास की खेती

भारतीय किसान में आप सभी किसान साथियो का बहुत बहुत स्वागत है आज हम लाये है खेती में कपास ( कॉटन ) की खेती के बारे में सम्पूर्ण जानकारी
जिस में हम आप को बीटी कपास देशी कपास की की वेराइटी और सीड के नाम और बीमारियों के बारे में बताये गे |

देशी कपास की उन्नत किस्में आर . जी . 8

मध्यम कद के ऊँचाई वाले पौधों की इस किस्म की पत्तियाँ कड़ी व गहरी कटी हुई , फूल हल्के पीले होते हैं , जिसकी पंखुड़ियों के भीतर की ओर लाल धब्बे होते हैं । इनके टिण्डे अण्डाकार होते हैं । यह किस्म 170-180 दिन में पकती है । इसकी ओटाई 40.2 प्रतिशत व रेशे की लम्बाई 16.3 मिलीमीटर होती है । इसकी उपज 20-26 क्विटल प्रति हैक्टेयर होती है ।

आर . जी . 18

यह किस्म मध्यम समय ( 160-170 दिन ) में पकने वाली एकांक्षी शाखाओं वाली किस्म है । इसके पौधों की ऊँचाई 130-140 से.मी. होती है । इसकी पत्तियाँ संकड़ी व बैंगनी रंग की होती हैं व फूलों का रंग गुलाबी होता है , जिस पर गहरे लाल रंग के धब्बे पाये जाते हैं । टिण्डे का आकार मध्यम ( औसत वजन 2.2 ग्राम ) व औसत ओटाई 38 प्रतिशत है । इसकी औसत उपज 24-26 क्विटल प्रति हैक्टेयर होती है ।

राज . डी . एच .9

इस जी.एस.एस.आधारित संकर किस्म के पौधों की ऊँचाई 140-145 से.मी. , पत्तियाँ अर्द्ध चौड़े आकार की व हरे रंग की होती हैं । फूल पीले रंग का , जिनकी पंखुड़ियों के अन्दर लाल धब्बे पाये जाते हैं । टिण्डों का आकार अण्डाकार होता है तथा औसत ओटाई 39 प्रतिशत है । इस किस्म की औसत उपज 26-27 क्विटल प्रति हैक्टेयर आंकी गई है । यह किस्म 160-170 दिन में पककर तैयार हो जाती है ।

एच . जी . 123

इस किस्म की पत्तियाँ सैकड़ी कटी होती हैं । इसमें फल छोटे एवं सफेद रंग के होते हैं , जिनकी पंखुड़ियों के अन्दर लाल – धब्बे पाये जाते हैं । इनकी औसत उपज लगभग 20-25 क्विटल / हैक्टेयर होती है । इसकी ओटाई 36-37 प्रतिशत होती है ।

आर . जी . 542

वर्ष 2013 में राजस्थान राज्य के लिए अनुमोदित देशी कपास की यह किस्म आर.जी. 255 ग.पी.ए. 255 के संयोग से विकसित की गई है । इसके पौधे 140-145 सेन्टीमीटर लम्बे होते हैं । फूल क्रीम रंग के तथा पंखुड़ियों की अन्दरूनी निचली सतह पर लाल धब्बे होते हैं । टिण्डों का औसत वजन 3.00 ग्राम होता है । ओटाई लगभग 35.9 प्रतिशत होती है , जबकि रेशे की औसत लम्बाई 23.2 मि.मि. पाई गई है । अनुकूल परिस्थितियों व उचित प्रबंधन से इस किस्म में रूई झड़ने की समस्या तुलनात्मक रूप से कम है ।

अमेरिकन किस्में बीकानेरी नरमा ( 1978 )

जल्दी पकने वाली इस किस्म के रेशे की लम्बाई 0.84 इंच , ओटाई 33-34 प्रतिशत तथ उच्चतम कताई क्षमता 32-34 है । बीज छोय एवं रोयेंदार होता है । पौधे की मध्यम ऊँचाई 135-165 सेन्टीमीटर , पत्तियाँ छोटी व हल्के रंग की तथा फूल छोटे हल्के पीले होते हैं । टिण्डे मध्यम आकार के होते हैं , जिनका औसत वजन 2 ग्राम होता है । फसल 190-200 दिन में पककर 16-20 क्विटल प्रति हैक्टेयर उपज देती है । हरा तैला कीट से इस किस्म में अन्य किस्मों की अपेक्षा कम हानि होती है ।

गंगानगर अगेती ( 1982 )

जल्दी पकने वाली इस किस्म के रेशे की लम्बाई 0.90-0.92 इंच , ओटाई 34-36 प्रतिशत तथा उच्चतम कताई क्षमता 34 36 है । पत्तियाँ औसत आकार की तथा गहरे रंग की होती हैं । फूल हल्के पीले रंग के , टिप्डे का आकार मध्यम , बीज हल्का रोयेदार , काले छिलके वाला होता है । इसके पौधे 120-150 सेटोमीटर ऊँचे एवं पकाव अवधि 170-180 दिन है । इसके उपज होती है । बाद येहूँ को फसल आसानी से ली जा सकती है । 20-24 क्विटल प्रति हैक्टेयर

आर . एस . टी .9

: इस अमेरिकन किस्म के रेशे की औसत लम्बाई 09 इंच , ओटाई 34-36 प्रतिशत तथा उच्चतम कताई क्षमता 28-30 है । पत्तियाँ हल्के हरे रंग की एवं फूल पीले होते हैं । टिण्डे मध्यम आकार के तथा औसत वजन 35 ग्राम होता है । इसके पौधे 130-140 सेन्टीमीटर ऊँचे एवं पकाव अवधि 185-200 दिन है । ओटाई प्रतिशत अन्य किस्मों से अधिक है । सिंचित क्षेत्रों हेतु उपयुक्त इस किस्म की औसत उपज 22-24 क्विटल प्रति हैक्टेयर होती है । हरा तेला कौट से अपेक्षाकृत कम हानि होती है ।

आर . एस . 2013

इस किस्म के पौधों की ऊंचाई 125-130 सेन्टीमीटर होती है । इसकी पत्तियाँ मध्यम आकार की व हल्के हरे रंग की होती हैं । इसकी पंखुड़ियों का रंग पीला होता है । इस किस्म में 2-3 एकांक्षी शाखाएँ तथा अन्य फलवाहिनी शाखाएँ होती हैं । फसल 165-170 दिन में पककर तैयार हो जाती है । इस किस्म में सुण्डी द्वारा हानि अन्य किस्मों की अपेक्षाकृत कम होती है । यह किस्म पत्ती मरोड़ विषाणु बीमारी के प्रति भी अवरोधी है । इस किस्म की औसत उपज लगभग 23-24 क्विटल प्रति हैक्टेयर है । आर.एस. 2013 किस्म , जहाँ सिंचाई ज्यादा उपलब्ध है , दूसरी किस्मों से ज्यादा फलन देती है

आर . एस . 810

इस किस्म में पौधों की ऊँचाई 125-130 से.मी. होती है । फूल पीले रंग के होते हैं । टिण्डों का आकार छोटा ( 2.50-3.50 ग्राम ) , रेशे की लम्बाई 24-25 मिलीमीटर व ओटाई क्षमता 33-34 प्रतिशत होती है । यह किस्म 165-175 दिन में पककर तैयार हो जाती है व 23-24 क्विटल प्रति हैक्टेयर उपज / पत्ती मोड़क रोग प्रतिरोधी है ।

आर . एस . 875

इस किस्म के पौधों की ऊँचाई 100-110 से.मी. , पत्तियाँ चौड़े आकार एवं गहरे हरे रंग की होती हैं । शून्य ( जीरो ) से एक एकांक्षी शाखाएँ पाई जाती हैं । टिण्डे का आकार मध्यम , औसत वजन 35 ग्राम , रेशे की लम्बाई 27 मिलीमीटर व तेल की मात्रा 23 प्रतिशत है , जो अनुमोदित किस्मों से अधिक है । इस किस्म की फसल 150 से 160 दिन में पककर तैयार हो जाती है , जिससे उसी खेत में सामान्य समय में गेहूं की बुवाई की जा सकती है ।

मरू विकास ( राज . एच . एच . 16 )

इस संकर किस्म के पौधों की ऊँचाई 135-145 सेन्टीमीटर , पत्तियाँ औसत आकार व हल्के हरे रंग की होती हैं । फूल हल्के पीले रंग के व 3-4 एकांक्षी शाखाएँ पाई जाती हैं । टिण्डे का आकार मध्यम , औसत वजन 45 ग्राम , रेशे की लम्बाई 27 मिलीमीटर व कताई सूतांक 40 है , जो अन्य अनुमोदित किस्मों से अधिक है । इस किस्म की फसल 170-180 दिन में पककर तैयार हो जाती है , जिससे उसी खेत में गेहूं की फसल आसानी से ली जा सकती है ।

बीटी किस्में एम.आर.सी.एच .6304 बीजी -1

यह एक अधिक उपज देने वाली अमेरिकन कपास की बीटी संकर किस्म है । यह चित्तीदार सूंडी , अमेरिकन सूंडी एवं गुलाबी सूंडी के प्रति अबरोधी है । इसकी पनियाँ हरी ( broad lobed ) होती हैं । इसमें 4-5 प्राथमिक तथा 15-20 द्वितीय शाखायें होती हैं । यह लगभग 165 170 दिन में पक कर तैयार हो जाती है । इसकी औसत पैदावार लगभग 25 क्विटल प्रति हैक्टेयर होती है ।

एम . आर . सी . एच . 6025

यह अमेरिकन कपास की बीटी संकर किस्म है । यह चित्तीदार सूंडी , अमेरिकन सूंडी एवं गुलाबी सूंडी के प्रति अवरोधी है । यह अपेक्षाकृत जल्दी ( 160-165 दिन में ) पककर तैयार हो जाती है । इसकी पत्तियाँ हरी ( broad lobed ) होती हैं । इसमें औसतन 20 द्वितीय शाखाएं होती हैं । इस किस्म की औसत पैदावार लगभग 25-27 क्विटल प्रति हैक्टेयर होती है । इसमें रेशे की लम्बाई 28.4 मि.मी. , ओटाई 34.7 प्रतिशत होती |

एम . आर . सी . एच . 314 बीजी – I

यह एक अधिक उपज देने वाली अमेरिकन कपास की बीटी संकर किस्म है । यह चित्तीदार सूंडी , अमेरिकन सूंडी एवं गुलाबो सूडो के प्रति अवरोधी है । रिहों का मानना 3.5 Amy सवाल पति हैकोचर होती है । होता है । इसके रेशे को लम्बाई 90 मि.मी. होती है

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आर . सी . एच . 14 बीजी- ।।

यह एक अधिक पैसाच पाली मीटरी संकर किस्म है , जो चिसोदार सूडी , अमेरिकन सूडी एवं गुलाबी सूडी के प्रति अवरोधी है । यह किस्म अन्य चोये किस्मों की अपेक्षा पत्ता मरोद विषाणु बीमारी के पति अधिक संवेदनशील है । इसमें औसतन 4-5 प्राथमिक एवं 15-17 द्वितीय शाखाएँ होती हैं । इसकी औसत पैदावार लगभग 25 क्विटल प्रति हैक्टेयर होती है एवं पकने में अपेक्षाकृत अधिक समय लेती है ।

जे . के . सी . एच . 1947

यह अमेरिकन कपास की बीटी संकर किस्म है । जो चित्तीदार सूडी , अमेरिकन सूंडी एवं गुलाधी सूंडी के प्रति अवरोधी है । इस किस्म में द्वितीय शाखाओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक होती है । अतः इसके पौधों की ऊँचाई अधिक होती है । इसमें टिण्डों का औसत वजन 4-45 ग्राम होता है । इसकी औसत पैदावार लगभग 25-30 क्विटल प्रति हैक्टेयर होती है । इसकी ओटाई लगभग 35 प्रतिशत होती है ।

: एन.ई. सी . एच .6

यह चित्तीदार सूडी , अमेरिकन सूंडी एवं गुलाबी सूंडी के प्रति अवरोधी बीटी संकर किस्म है । इसमें प्राथमिक शाखायें औसतन 4-5 एवं द्वितीय 20-25 शाखायें होती हैं । इसमें टिण्डे अन्य बीटी किस्मों से छोटे होते हैं । औसत वजन 3-3.15 ग्राम होता है । इसकी औसत पैदावार लगभग 25-27 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती है । इसके रेशों की औसत लम्बाई लगभग 27 मि.मी. होती है ।

एम . आर . सी . 7017 बीजी -11

यह एक अधिक उपज देने वाली अमेरिकन कपास की बीटी संकर किस्म है । यह किस्म चित्तीदार सूंडी , अमेरिकन सूडी एवं गुलाबी सूंडी के अतिरिक्त तम्बाकू वाली सूंडी ( स्पोडोपटेरा ) के प्रति अवरोधी है । इस किस्म की उत्पादन क्षमता 25-30 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती है । इसमें द्वितीय शाखाएँ अपेक्षाकृत अधिक होती हैं । इसके रेशों की औसत लम्बाई लगभग 32 मि.मी. के लगभग होती है ।

बायोसीड 6588 बीजी- II

यह एक अधिक उपज देने वाली अमेरिकन कपास की बीटी संकर किस्म है । यह चितकबरी सूंडी , गुलाबी सूंडी एवं तम्बाकू वाली सूंडी के प्रति अवरोधी है । इसके पौधे की ऊँचाई 150-175 सेन्टीमीटर है । इसके टिण्डों का वजन 44 से 48 ग्राम तक है । इसकी औसत पैदावार 24-28 क्विटल प्रति हैक्टेयर है । यह पत्तामरोड़ बीमारी के प्रति मध्यम रूप से प्रतिरोधी

बायोसीड BT बीजी- II

: यह एक अधिक उपज देने वाली अमेरिकन कपास की बीटी संकर किस्म है । यह चितकबरी सूंडी , अमेरिकन सूंडी , गुलाबी सूंडी एवं तम्बाकू वाली सूंडी के प्रति अवरोधी है । इसके पौधों की ऊँचाई 150 170 सेन्टीमीटर है । इसके टिण्डों का वजन 4.5 से 49 ग्राम तक है । इसकी औसत पैदावार 22-26 क्विटल प्रति हैक्टेयर है । यह पत्तामरोड़ बीमारी के प्रति मध्यम रूप से संवेदनशील है ।

आर . सी . एच . 650 बीजी- II

यह एक अधिक उपज देने वाली अमेरिकन कपास की बीटी संकर किस्म है । यह चितकबरी सूंडी , अमेरिकन सूंडी , गुलाबी सूंडी के अतिरिक्त तम्बाकू वाली सूंडी के प्रति अवरोधी है । इसके पौधों की ऊँचाई 150-160 से.मी. है । इसके टिण्डों का वजन 45 से 4.75 ग्राम तक है । इसकी औसत पैदावार 22-26 क्विटल प्रति हैक्टेयर है । यह पत्तामरोड़ बीमारी के प्रति मध्यम रूप से संवेदनशील है ।

खेत की तैयारी

कपास के लिये चिकनी मिट्टी अधिक उपयुक्त रहती है । जिन खेतों में पानी भरे रहने व क्षारीयता की सम्भावना हो वहाँ नरमा नहीं बोना चाहिये । एक बार मिट्टी पलटने वाले हल तथा बाद में त्रिफाली या हैरो से दो – तीन बार जुताई कर भूमि तैयार करें ।
भूमि उपचारः अन्तिम पृष्ठों में भूमि उपचार शीर्षक में दिये गये विवरण के अनुसार उपाय अपनायें । खाद एवं उर्वरक : 1. बुवाई से तीन – चार सप्ताह पहले 25-30 गाड़ी गोबर की खाद प्रति हैक्टेयर की दर से जुताई कर भूमि में अच्छी तरह मिला देवें । 2.अमेरिकन एवं बी.टी. किस्मों में प्रति हैक्टेयर 75 किलो नत्रजन और 35 किलो फास्फोरस की आवश्यकता पड़ती है । 3. देशी किस्मों को प्रति हैक्टेयर 50 किलो नाजन एवं 25 किलो फास्फोरस की आवश्यकता होती है । 4. पोटाश उर्वरक मिट्टी परीक्षण के आधार पर देवें । फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नवजन की आधी मात्रा बुवाई से पहले देवें । नत्रजन की शेष आधी मात्रा फूलों की कलियाँ बनते समय देवें । सूक्ष्म तत्व सिफारिश : मृदा जाँच आधार पर जिंक तत्व की कमी निर्धारित होने पर बुवाई से पूर्व बी.टी / नरमा कपास में 25 किलोग्राम जंक सल्फेट का मिट्टी में मिलाकर उर कर या फैलाकर दिया जाना चाहिए । यदि बुवाई के समय जिंक सल्फेट नहीं दिया गया हो तो 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट के घोल का दो छिड़काव पुष्पन तथा टिण्डा वृद्धि अवस्था पर करने से अधिक उपज ली जा सकती है । इस उपचार से जड़ गलन की समस्या से भी निजात मिलेगी । सल्फर : अमेरिकन कपास में यदि फास्फोरस डी.ए.पी. द्वारा देते हैं तो उसके साथ 150 किलो जिप्सम प्रति हैक्टेयर देवें । यदि फास्फोरस सिंगल सुपर फास्फेट द्वारा दे रहे हों तो जिप्सम देने की आवश्यकता नहीं है ।

: बीज दर एवं बीज उपचार

देशो कपास की बुवाई हेतु 12-15 किलोग्राम बीज हैक्टेयर काम में लेवें । अमेरिकन कपास की बुवाई हेतु 15-16 किलोग्राम बीज हैक्टेयर काम में पायी है । लेखें । बीटी कपास की बुवाई हेतु 2 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टेयर की आवका कपास के बीज में छुपी हुई गुलाबी रॉडी को नष्ट करने के लिये बोरे को भूमित कर लीजिये 1 40 किलो तक बीज को धूमित करने के लिए एल्यूमीनियम फॉरफॉइड की एक गोली बीज में डालकर उसे हवारोधी बनाकर चौवीस यण्टे रूप में फैलाकर 6 घण्टे तक तपने देखें । तक बन्द रखें । धूमित करना सम्भव न हो तो तेज धूप में बीजों को पतली तह के बीजों से रेशे हटाने के लिये जहाँ सम्भव हो , 10 किलो बीज के लिये एक लीटर व्यापारिक गंधक का तेजाब पर्याप्त होता है । मिट्टी या प्लास्टिक के बर्तन में बीज डालकर तेजाब डालिये और एक – दो मिनट तक लकड़ी से हिलाइये । बीज काला पड़ते ही तुरन्त बीज को बहते हुए पानी में धो डालिये और ऊपर तैरते हुए बीज को अलग कर दीजिये । गंधक के तेजाब से बीज के उपचार से अंकुरण अच्छा होगा । यह उपचार कर लेने पर बीज को प्रधुमन की आवश्यकता नहीं रहेगी । फसल को बीजजनित रोग न हो , इसके लिये बीज को 10 लीटर पानी में एक ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या ढाई ग्राम एग्रीमाइसिन के घोल में 8-10 घण्टे तक भिगोकर सुखा लीजिये और फिर बोने के काम में लेवें । जहाँ पर जड़ गलन रोग का प्रकोप होता है , वहाँ बीजों को 3 ग्राम थाईरम या 2 ग्राम कार्वेण्ड्यजिम से प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करके बोयें । असिंचित स्थितियों में कपास की बुवाई के लिए प्रति किलो बीज को 10 ग्राम एजेक्टोबेक्टर कल्चर से उपचारित कर बोने से उपज में वृद्धि होती है । बुवाई का समय तथा विधि : कपास की बुवाई का उपयुक्त समय अप्रैल के द्वितीय पखवाड़े से मई के समय प्रथम सप्ताह तक है । अमेरिकन किस्मों में कतार से कतार की दूरी 60 सेन्टीमोटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 45 सेन्टीमीटर रखनी चाहिये । देशी किस्मों में कतार से लगावें कतार की दूरी 45 सेन्टीमीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 30 सेन्टीमीटर रखना चाहिये ।
आर.एस.टी .9 की बुवाई मई के प्रथम सप्ताह में करें एवं कतार से कतार को दूरी 70 सेन्टीमीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 45 सेन्टीमीटर रखें । बीटी किस्मों में कतार से कतार की दूरी 100 सेन्टीमीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 60 सेन्टीमीटर रखें । पॉलीथिन की थैलियों में पौध तैयार कर रिक्त स्थानों पर रोप कर वांछित पौधों की संख्या बनाये रख सकते हैं । लवणीय भूमि में यदि कपास बोई जाये तो मेहें बनाकर मेड़ों की दाल पर बीज चोभिये । सिंचाई एवं निराई – गुड़ाई : बुवाई के बाद 5-6 सिंचाई करें । उर्वरक देने के बाद और फूल आते समय सिंचाई अवश्य करें । दो फसली क्षेत्र में 15 अक्टूबर के बाद सिंचाई नहीं करें । अंकुरण के बाद पहली सिंचाई 20-30 दिन में कीजिये । इससे पौधों की जड़ें ज्यादा गहराई तक बढ़ती हैं । इसी समय पौधों की छंटनी भी कर दीजिये । बाद की सिंचाइयाँ 20-25 दिन बाद करें । नरमा / बीटी की प्रत्येक कतार में ट्रिप लाइन डालने की बजाय कतारों के जोड़े में ड्रिप लाइन डालने से ड्रिप लाइन का खर्च आधा हो जाता है । इसमें पौधे से पौधे की दूरी 60 से.मी. रखते हुए जोड़ें । कतार से कतार की दूरी 60 से.मी. रखें तथा जोड़े से जोड़े की 120 से.मी. रखें । प्रत्येक जोड़े में ड्रिप लाइन डालें । हिप लाइन में ड्रिपर से ट्रिपर की दूरी 30 से.मी. हो तथा प्रत्येक डिपर पानी रिसने की दर 2 लीटर प्रति घण्टा हो । सूखे में बीजाई करने के बाद लगातार 5 दिन तक 2 घण्टे प्रति दिन के हिसाब से ड्रिप लाइन चला देवें । इससे उगाव अच्छा होता है । बुवाई के 15 दिन बाद बूंद – बूंद सिंचाई प्रारम्भ करें । बूंद – बूंद सिंचाई का समय संकर नरमा की सारणी के अनुसार ही रखें । वर्षा होने पर वर्षा की माग के अनुसार सिंचाई उचित समय के लिए बन्द कर दें । पानी एक दिन के अवसर पर लगायें । 10 मीटर क्यारे की चौड़ाई एवं 97.50 प्रतिमा का पा लिया स अधिकतम उपज तो जा सकती है ।

सिंचाई पद्धति

बूंद – बूंद सिंचाई पद्धति से सिफारिश किये गये नाजन की मात्रा 6 बराबर भागों में दो सप्ताह के अन्तराल पर ड्रिप संयंत्र द्वारा देने से सतही सिंचाई की तुलन में ज्यादा उपयुक्त पायी गयी । इस पद्धति से पैदावार बढ़ने के साथ – साथ सिंचाई में जल की बचत , रूई कलियों की गुणवत्ता में बढ़ोतरी तथा कीड़ों के प्रकोप में भी कमी होती है । कपास में खरपतवार नियंत्रण के लिये एक माह बाद एक अच्छी निराई गुड़ाई अवश्य करनी चाहिये । इसके बाद आवश्यकतानुसार दूसरी निराई – गुड़ाई करें । यदि फसल में बोई किस्म के अलावा दूसरी किस्म के पौधे मिले हुए दिखाई दें तो उन्हें निराई के समय उखाड़ दीजिए क्योंकि मिली हुई कपास का मूल्य कम मिलता है । कपास की चुनाई : कपास में डोडे पूरे खिल जायें , तब उनकी चुनाई कर लीजिये । प्रथम चुनाई 50-60 प्रतिशत टिण्डे खिलने पर शुरू करें एवं दूसरी शेष टिण्डों के खिलने पर करें ।

फसल चक्र

रसायन कपास की कतारों के बीच एक कतार बैसाखी मूंग की बोना लाभप्रद है । करें बारानी क्षेत्र में अन्तर्शस्य अपनाना उपयुक्त है । जुड़वाँ कतार विधि से अन्तर्शस्य पैदावार अधिक लाभप्रद रहती है । फसल सिंचित क्षेत्र में निम्न फसल – चक्र लाभप्रद व उपज में वृद्धि करने वाले पाये गये हैं ।

  • कपास – गेहूँ ( एक वर्ष )
  • मक्का – गेहूँ – कपास – मैथी ( दो वर्ष )
  • मक्का- सरसों – कपास – मैथी ( दो वर्ष )
  • 4 ग्वार- गेहूँ- चारा- कपास ( दो वर्ष )

फसल संरक्षण

फूल व टिण्डों के गिरने की रोकथाम : स्वत : गिरने वाली पुष्प कलियों व टिण्डों को बचाने के लिये एन.ए.ए. 20 पी पी एम . ( 2 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी ) का घोल बनाकर पहला छिड़काव कलियाँ बनते समय तथा दूसरा टिण्डों के बनना शुरू होते ही करना चाहिए । डिफोलिएसन नियंत्रण : नरमा / कपास की फसल में पूर्ण विकसित टिण्डे हेतु 50-60 प्रतिशत टिण्डे खिलने पर 50 ग्राम माप अल्ट्रा ( थायाद्ययाधुरिन ) को 150 लीटर पानी में घोल कर प्रति बीघा की दर से छिड़काव करने के 15 दिन के अन्दर करीब – करीब पूर्ण विकसित सभी टिण्डे खिल जाते हैं । झप अल्ट्रा का प्रयोग करने का उपयुक्त समय 20 अक्टूबर से 15 नवम्बर है । इसके प्रयोग से कपास की पैदावार में वृद्धि पाई गई है । गेहूँ की बिजाई भी समय पर की जा सकती है । जिन क्षेत्रों में कपास की फसल अधिक वानस्पतिक बढ़वार करती है , वहाँ पर फसल की अधिक बढ़वार रोकने के लिए बिजाई 90 दिन उपरान्त रसायन साइकोसिल 80 पी.पी.एम. ( 8 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी ) का छिड़काव करें । नरमे की किस्म आर.एस. – 875 में बुवाई के 35 दिन डिटोपिंग करने पर पैदावार में वृद्धि होती है । फसल संरक्षण : समेकित नाशीजीव प्रबंधन : कपास की फसल को वैसे तो बहुत सारे कीट हानि पहुँचाते हैं परन्तु जो कीट आर्थिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण हैं , उनके बारे में विस्तृत जानकारी दी जा रही है । हरा तेला : पनियों की निचली सतह पर शिराओं के पास बैठकर रस पूस कर हानि पहुंचाता है , जिससे पत्तियों के किनारे हल्के पीले पड़ जाते है , प्लम्वरूप ये पनियाँ किनारों से नीचे की तरफ मुड़ने लगती है ।
तेले का अधिक प्रकोप होने से पत्तियों में लाल – बैंगनी रंग के धब्बे ( जल फफोले जैसे ) पड़ जाते हैं , फलस्वरूप ऐसी सभी पत्तियाँ मुड़कर व सूखकर नीचे गिर जाती हैं । कीट का सक्रिय काल ( मध्य जुलाई से सितम्बर ) है । इस कीट का पड़ने आर्थिक हानि स्तर ( ई.टी.एल. ) 2 से 3 अवयस्क प्रति पत्ती या पत्तियों के किनारे हल्के पीले दिखाई देते हैं ।

प्रबंधन

इस कीट का बीकानेरी नरमा , आर.एस.टी. 9 , आर.एस .810 थायोक्लोप्रिड किस्मों में आक्रमण कम होता है । कतार से कतार की दूरी 67.5 से.मी. से अधिक न रखें अन्यथा कीट का प्रकोप बढ़ सकता है । परभक्षी क्राईसोपा 10 हजार प्रति पानी बीघा की दर से छोड़ें । आवश्यकता पड़ने पर परभक्षी को फूल अवस्था में पुनः दोहरायें । आवश्यकता पड़ने पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 0.2 मिलीलीटर प्रवेश प्रति लीटर या मोनोक्रोटोफास 36 एस.एल .2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या एसीफेट 75 एम.पी .2.0 ग्राम प्रति लीटर या डाईमिथोएट 30 ई.सी .2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या थायोमेथोग्जाम 25 डब्ल्यू.जी .0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें । सफेद मक्खी : यह पत्तियों की निचली सतह से रस चूसती है , साथ ही शहद जैसा चिपचिपा पदार्थ छोड़ती है । जिसके ऊपर फफूंद उत्पन्न होकर बाद में पत्तियों को काला कर देती है । अधिक प्रकोप होने पर पत्तियाँ राख व तेलिया दिखाई देती हैं । यह कीट विषाणु रोग ( पत्ता मरोड़ ) भी फैलाता है और इस कीट का सक्रिय काल अगस्त आखिर से मध्य अक्टूबर है । इस कीट का आर्थिक हानि स्तर पौधों ( ई.टी.एल. ) है – वयस्क 8 से 12 प्रति पत्ती , अवयस्क 16 से 20 प्रति पती में ( फसल में कीट की संख्या सुबह 9 बजे से पहले देखें ) या फसल में 20 से 25 प्रतिशत कीटग्रसित पौधे फफूंद , राख व तेलयुक्त दिखाई देवें । प्रबंधन : कीटरोधी किस्में बीकानेरी नमरा , मरु विकास , आर एस 875 उगायें । 8 से 12 येलो स्टिकी ट्रेप ( खाली पोपों पर पीला पेंट व अरण्डी का तेल लगाकर ) प्रति बीघा की दर से फसल में कीट के सक्रिय काल में लगायें ।

सुरक्षा के तरीके

परभक्षी क्राईसोपा 12 हजार प्रति बीघा की टर से छोई आवस्यकता पड़ने पर परभक्षी को फूल अवस्था में पुन : दोहरायें । आवश्यकता पड़ने का नोमयुक्त + तरल साबुन ( 5 मि.ली.-1मि.लि. ) प्रति लीया बातिल का तेल • तरल साबुन ( 125 मि.ली. + 1 मि.ली. ) प्रति लीय या ट्राईजाशमी , 25 मिलीलीटर प्रति लीटर या एसीटामिप्रीड 20 एस.पी .0.4 प्राण प्रति लीया या बायोक्लोप्रिड 240 एस.पी. 10 मिलीलीटर प्रति लीटा या थायमिथोम्जाम 25 जी .05 ग्राम प्रति लीटर या डाईफेन्यूरान 50 डब्ल्यू पी .2 ग्राम प्रति लीट पानी दर से किसी एक रसायन का छिड़काव करें । चितकबरी सूंडी : प्रारम्भ में लटे तने एवं शाखाओं के शीर्षस्य भाग में प्रवेश कर उन्हें खाकर नष्ट करती हैं तत्पश्चात् कीटासित ये भाग सूख जाते हैं । लट से प्रभावित कलियों की पंखुड़ियाँ ( परिपत्र ) पीली होकर आपस में एक – दूरो से दूर हटती हुई दिखाई देती हैं । जैसे ही पौधों पर कलियाँ , फूल एवं टिण्डे बनने शुरू होते हैं , लोटन कर आक्रमण कर देती हैं , जिसके फलस्वरूप कोटसित फलीय भाग कारी जमीन पर गिर जाते हैं । इस कीट का सक्रिय काल जुलाई में मध्य अक्टू । इस कीट का आर्थिक हानि स्तर ( ई.टी.एल. ) है – प्रत्येक परेर जीसतान 8 से 10 कलियाँ ( बड़ ) दिखाई देने पर या लटों द्वारा काल के अदा कलीय भागों में 10 प्रतिशत नुकसान ( पौधों एवं जमीन पर गिरे हुए दिखाई देने वा 2 पौधों पर औसतन 20 लटें ( छोटी व बड़ी ) दिखाई देने पर या फसल को लावल्या में विशेषकर कलियाँ बनते समय 4 से 6 नर पतंगे प्रति फेरोमोन ट्रेप के अन्दर सप्ताह में 3-4 दिन दिखाई देने पर । प्रबंधन : फसल में कीटग्रसित तने एवं शाखाओं के शीर्षस्य भाग को तोड़ एवं जलाकर नष्ट कर देना चाहिये । 5 से 10 फेरमोन ट्रेप ( लिंग आकर्षण ) प्रति हैक्टेयर नर पतंगों का पता एवं उनको नष्ट करने हेतु लगाये । जीडो दाईकोग्रामा 40 हजार प्रति बीघा की दर से शाम के समय कमल में छोड़ें । यह प्रक्रिया कम से कम 3 बार ( 7 दिन अन्तरात ) पर अवश्य दान याद रहे कि ट्राईकोग्रामा परजीवी केवल फेरेमोन ट्रेप के अन्दर पतंगे एवं फरन । पों व कलियों पर अण्डे दिखाई देने पर ही छोड़ें अन्यथा नहीं । परभवी कायम बार 12 हजार प्रति बीघा की दर से छोड़े , आवश्यकता पड़ने पर परभवी को पुन : छोड़ें । आवश्यकता पड़ने पर मोनोक्रोटोफोम 36 एयजने में 20 मिलीलीटर प्रति लीटर या फेनवेलरेट 20 ई.सी. 10 मिलीलीटर प्रति लीय पतों या मेलाथियान 50 ई.सी या 20 मिलीलीटर प्रति लीटर या क्लोरोपाईरीपाय 20 ई.सी. 50 मिलीलीटर प्रति लीटर या डेल्टामेधिन 28 ई.मी .1.0 मिलीलीय ( प्रति लीटर या क्यूनालफॉम 25 ई.सी 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या इन्डोक्याका केवल 145 एम.सी .1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या स्पाईनोरोड 45 एस.सी. ( न्यू.ए.टी ( रेशो ) 0.33 मिलीलीटर प्रति लीटर या फ्लूबेन्डियामाइड 480 एस.सी .0 / 40 मिलीलीय प्रति लीटर पानी की दर से किसी एक रसायन का छिड़काव करें । लीटाया अमेरिकन सूंडी : पौधों में फलीय भाग उपलब्ध न होने पर अमेरिकन 10 सूंडी पत्तियों को खाकर एक गोल गोल छेद कर नुकसान करती है । लटयमित इथियान कलियाँ एवं टिण्डों में सुराख से अपेक्षाकृत बड़े ( 2 से 3 मिलीलीटर ) आकार के 075 होते हैं । लीटर फूल एवं टिण्डों के अन्दर नुकसान करती लटों का मल पदार्थ फल भाग किसी के बाहर निकला हुआ दिखाई देता है । कीट सक्रिय काल सामान्य तौर पर मध्य आगे – पीछे भी हो सकता है । अगस्त से मध्य अक्टूबर तक है , परन्तु विशेष परिस्थिति में कोट का आक्रमण इस कीट का आर्थिक हानि स्तर ( ई.टी.एल. ) है – फसल के फलीय भागों ( पौषों एवं जमीन पर गिरे हुए ) में 5 प्रतिशत नुकसान दिखाई देने पर या मिलती फसल की फलावस्था में 3 से 4 नर पतंगे प्रति फेरोमोन ट्रेप के अन्दर सप्ताह में जोड़कर से तीन दिखाई देने पर या 20 पौधों पर 10 लटें दिखाई देने पर । प्रबंधन : प्रौद नर पतंगों का प्रति हैक्टेयर 5 लिंग आकर्षक परा ( फेरोमोन ट्रेप ) की दर से लगाकर कोट के आगमन का पता किया जा सकता है । प्रभास पाश ( लाइट ट्रेप ) को सूर्य अस्त होने के दो घण्टे बाद तथा सूर्योदय के 2 घण्टे पूर्व जलाकर प्रौद पतंगों को आकर्षित कर नष्ट किया जा सकता है ।
अण्डे व छोटी – बड़ी इंडियों को मजदूरों की मदद से सप्ताह में एक या दो बार हाथ से चुनकर नष्ट किया जा सकता है । परजीवी ट्राईकोपामा 40 से 50 हजार प्रति बीघा की दर से फेरोमोन ट्रेप के अन्दर प्रौढ़ एवं फसल में अण्डे दिखाई देने पर ही छोड़ें । परभक्षी क्राइसोपा 10 से 12 हजार प्रति बीघा की दर से फसल में पत्तों पर अण्डे दिखाई देने पर छोड़ें । न्यूकलियर पोलिहाइझेसीस वायरस ( एन पी.वी. ) का 0.75 मिलीलीटर ( एल.ई. ) प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें । वायरस की मारक क्षमता केवल दूसरी एवं तीसरी अवस्था की सूडियों पर अधिक रहती है । नीमयुक्त दवा ( 300 पीपीएम ) / 50 मिलीलीटर पानी की दर से छिड़कें । आवश्यकता पड़ने पर क्यूनालफॉस 25 ई.सी. 20 मिलीलीटर प्रति लोटर या मैलाथियान 5० ई.सो .2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या डेल्यमेधिन 28 ई.सी. 10 मिलीलीटर प्रति लीटर या थायोडिका 75 एम . पी . 175 ग्राम प्रति लीटर या इथियान 50 ई.सी. 30 मिलीलीटर प्रति लीटर या बोटासिफतूधिन 25 ई.सी. 075 मिली लीटर प्रति लीटर या क्लोरोपाईरोपांस 20 ई.सी .50 मिलीलीटर प्रति लीटर या अल्फामेधिन 10 ई.सी. 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से किसी एक रसायन का छिड़काव करें । गुलाबी सूंडी : गुलाबी सूंडी के नुकसान की पहचान अपेक्षाकृत कठिन होती है , क्योंकि लॉ फलीय भागों के अन्दर छुपकर तथा प्रकाश से दूर रहकर नुकसान करती हैं । फिर भी अगर कलियाँ फूल एवं टिण्डों को काटकर देखें तो फलीयोटो अवस्था में लटें प्राय : फलीय भागों के ऊपरी हिस्सों ( एपोकल पार्ट ) में मिलती हैं । लम्बे जीवनकाल वालो तटें टिण्डों में प्रवेश कर दो योजों के आपस में मेंबड़कर व उन्हें अन्दर से खाकर नुकसान पहुंचाती हैं । कोट का सक्रिय काल मध्य जुलाई से मध्य अक्टूबर तक है । इस कीट का आर्थिक हानि स्तर ( ई.टी एल . ) है – फसल के फलीय भागों में 10 प्रतिशत नुकसान दिखाई देने पर या 20 पौधों पर औसतन 20 लटें दिखाई देने पर या फसल को फलावस्था में 5 से 8 नर पतंगे प्रति फोरोमोन ट्रेप के अन्दर सप्ताह । कसे 4 दिन दिखाई देने पर ।
प्रबंधन : ऐसे सभी फूल जिनकी पंखुड़ियाँ ऊपर से चिपकी हों ( रोमेटिया बलूम ) उन्हें हाथ से तोड़कर उनके अन्दर मौजूद गुलाबी सूडियों को नष्ट किया जा सकता है । यह प्रक्रिया सप्ताह में कम से कम एक बार अवश्य करें । 5 लिग आकर्षण जाल ( फेरोमोन ट्रेप ) प्रति हैक्टेयर पर पतंगों को नष्ट करने हेतु लगावें आवश्यकता पड़ने पर साइपरमेधिन 10 ई.सी. 10 मिलीलीटर प्रति लोटर या साइपरमेथ्रिन 25 ई.सी. 04 मिलीलीटर प्रति लीटर या कार्वरित 50 डब्ल्यू पी . 45 ग्राम प्रति लीटर या ट्राइजोफॉस 40 ई.सी. 2.5 मिली लीटर या मेलाधिपान 50 ई.सी .2.0 मिलीलीटर या डेल्टामेथ्रिन 28 ई.सी .1.0 मिलीलीटा प्रति लोरा या फलूबेन्डियामाइड 480 एस.सी .04 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से किसी एक रसायन का छिड़काव करें । तम्बाक लट ( स्पोडोपटेरा ) : यह लट बहुत ही हानिकारक कीट है । इसको लटें पौधों की पत्नियाँ खाकर जालीनुमा बना देती हैं व कभी – कभी पौधों की पत्तियाँरहित कर देती हैं । कपास पर यह कीट कलियों , फूलों तथा कभी – कभी टिण्डों में काफी नुकसान पहुंचाता है । इस लट का प्रकोप मध्य अगस्त से अक्टूबर माह तक बना रहता है । इस कीट का आर्थिक हानि स्तर ( ई.टी.एल. ) है – फसल में जब 10 पौधो में से एक पौधे पर अण्डों का पुन्ज ( समूह ) पत्ती की निचली सतह पर दिखाई देने पर दवाओं में से किसी एक का प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें । प्रबंधन : खेत के बॉर्डर पर अरण्डी की फसल ट्रेप फसल के लगायें । खेत को खरपतवारों से साफ रखें । पत्थरचटा ( साटा , इटसिट ) व कांग्रेसबासन पनपने दें । इस कीट के अण्डों के समूह , जो कि पत्तियों की नीचे वाली सतह पर होते हैं , उन्हें इकट्ठा करके नष्ट कर दें । लटों को हाथ में इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए । प्रौढ़ कीट ( पागों ) को फेरोमोन ट्रेप लगाकर पका जा सकता है अत : 10 ट्रेप प्रति हैक्टेयर की दर मे खेत में लगाने चाहिए । पतंगे रात्रिचर होते है तथा प्रकाश की ओर आकर्षिी चाहिए । होते हैं , अत : खेत के चारों तरफ प्रकाश प्रपंच लगाकर उन्हें नियन्वित कर प्रबंधन
आवश्यकता पड़ने पर थायोड़ीकार्ड 75 एस पी 1.75 ग्राम प्रति लीटर या क्लोरपाइरिफास 20 ई.सी. 0.5 मिली / लीटर या क्यूनालफॉस 25 ई.सी. 0. 2 मिली / खोटर या एसोफेट .75 एस पी .2 ग्राम / लीटर या न्यूवालूयेन 10 ई.सी । मिली / लोटर या इमामैक्टन चैनजोएट 5 एस.जी. 0.5 ग्राम / लीटर या पल्लूवैन्डीयामाइड 480 एस . पी . 0.4 मिली / लीटर पानी की दर से किसी एक रसायन का छिड़काव मिलीबग : इस कीट के मुखांग रस चूसने वाले होते हैं । हमारे क्षेत्र में मिलीषण की दो प्रजातियां पाई जाती है – फोनोकोक्स सोलेनोपसिस व फिनोफोक्स सोलनोस । कीट अनुकूल परिस्थितियों में भूमि से निकलकर खेत के आसपास के खरपतवारों पर संरक्षण लेते हैं । फिर मुख्य फसल पर आते हैं । खेत में अधिक प्रकोप होने पर पता चलता है । कोट के निम्फ / क्राईवलर्स व वयस्क दोनों ही पत्तियों , डण्ठलों , कलियों , फूलों , टहनियों व टिण्डों से रस चूसते हैं । कीट के अधिक प्रकोप से पत्तियाँ पीली होकर गिर जाती है । कीट अपने मल के साथ मीठा रस पत्तियों पर छोड़ता है , जिससे पत्तियों पर काली कवक उत्पन्न हो जाती है । इसके कारण प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है । प्रबंधन : 1. फसल चक्र को अपनायें । एक ही खेत में लगातार नरमा कपास की फसल ना लें । 2. मिलीबग की रोकथाम हेतु चींटियों का नियंत्रण करना जरूरी है क्योंकि मिलीबग चींटियों की सहायता से एक खेत से दूसरे खेत में प्रवेश कर जातो है । इसके लिए खेत के चारों तरफ अवरोध का घेरा बनायें और क्यूनालफॉस इस्ट का प्रयोग करें । भूमि में तैयार किये गये चीटियों के बिलों को नष्ट कर दें । 3 खेत में ग्रसित फसलों के अवशेषों को इकट्ठा करके जला दें । खेत में पखेत के चारों तरफ उगे यरपतवारों को नष्ट कर दें , उन्हें नहरों खालो में ना डाले ।5.मिलीबग से ग्रसित खेत में काम में लिये गये औजारों की सफाई का ही अन्य खेत में लेकर जायें । 6. मिलीबग नरमा । कपास की छंट्टियों के अंदर रहते हैं अत : छट्टियों फरवरी माह से पहले – पहले जला देना चाहिए।छट्टियों का खेत में ढेर नहीं लगा छिड़काव छिड़काव चाहिए । 7. फसल के चारों तरफ बाजरा व ज्वार की दो – दो कतार बोयें । ३. फसल के पास ग्वार , भिण्डी को न बोयें । जैव नियंत्रण : मिलीबग कीट पर आक्रमण करने वाले कीट निम्नलिखि परभक्षी लेडीबर्डबीटल : बरूमेडस लिनीटस , कोक्सीनैला सेपटेम्पूनेद चिलोमेन्स सेक्समाकूलाटा , रोडोलिया फूमिडा , क्रिप्येलीम्स मोनट्रोज्यूरी व क्राइसोपस कारनी परभक्षी कीटों को खेत में छोड़ें । परजीवी कीट : अनागीरस रामली व अनीसीअस बोम्बावाली भी खेत छोड़ें । रासायनिक नियंत्रण : कीटनाशक रसायनों का छिड़काव पौधों के तने ऊपरी भाग पर अच्छी तरह से करें व दूसरा छिड़काव जल्दी ही दोहरायें । मिलीच से ग्रसित खेत को तैयार करते समय क्यूनालफॉस चूर्ण 25 कि.ग्रा . हैक्टेयर की से मिला करके गहरा चलायें या खेत में पलेवा देते समय क्लोरोपाइरीफास ( 20 ई.सी. 24 लीटर / हैक्टेयर सिंचाई के साथ दें । खेत में मिलीबग दिखाई देने पर मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी .1 मिली लीटर या क्यूनालफॉस 25 ई.सी .2 मिली / लीटर या ट्राईजोफॉस 40 ई.सी .1 मिला लीटर या प्रोफेनोफास 50 ई.सी .1.5 मिली / लीटर पानी या एसिटामिप्रिड 20 एस . 1 ग्राम / लीटर या क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी .2 मिली / लीटर या एसीफेट 75 एस 2 ग्राम / लीटर या थायोडिकार्य 75 डब्ल्यू.पी . 2 ग्राम / लीटर पानी की दर किसी एक रसायन का छिड़काव करें ।
रोग प्रबन्धन

जीवाणुअंगम

भारतीय किसान पर बने रहने के लिए बहुत बहुत आभार bhartiyakisan.com एक कृषि पोर्टल है जिस केन माध्यम से किसानो में जागरूकता लाना व किसनो को उन्नत खेती की और अग्रसर करना है |
धन्यवाद
भारतीय किसान

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