Thursday, October 22, 2020
खेती में रासायन का उपयोग किस तरह करे

खेती में रासायन का उपयोग किस तरह करे

नमस्कार दोस्तों भारतीय किसान पोर्टल पर आप सभी किसान भाइयों का स्वागत है।

आज हम बात करेंगे रासायनिक खेती के बारे में किसान भाइयों रासायनिक खेती से खेत खराब होते जा रहे हैं रसायन का उतना ही उपयोग करें जितना मापदंड है। अधिक उपयोग से खेती बंजर  बनती जा रही है।

खेती में रासायन का उपयोग किस तरह करे

रासायनिक नियन्त्रण-

 नाशीजीव रसायन – रासायनिक पदार्या द्वारा कीटो को मारना , भगाना या इनकी समष्टि को कम करना रासायनिक नियन्त्रण कहलाता है और वह पदार्थ जो ऐसा करने में सहायक हो बीट विष बाहलाते है । कोई भी जीव जिसकी समष्टि पृद्धि एक निश्चित स्तर से अधिक होकर आर्थिक हानि पहुँचाने लायक हो जाये तथा जिनका अस्तित्व मनुष्य के कल्याण , सुविधा तथा लाभ में परस्पर विरोध उत्पन्न को उसे नाशक जीव कहते हैं । हे रसायन जो जीटी या अन्य जीयों को , जो मनुष्य तथा उसकी कृषि एवं प्राणियों की प्राति पहुँचाते  मारने या भगाने जो काम आते है , पीड़कनाशी कहलाते है ।

कीटनाशी रसायन – फसलों , सब्जियों , फल वृक्षों एवं राधित अनाज को नाराया कीटों से बचाने हेतु उनको मारने या प्रतिकर्षित करने के लिए जिन विषले रसायनों से नियन्त्रण करते है उनको कीटनाशी कहते है । कीटनाशी शब्द का अर्थ  कीटों का नाश करने वाला । इसलिये कीटों को मारने वाले पदार्थ कीटनाशी पहलाते है । नाशक कीटों के अधिक प्रकोप के समय इनको प्रमुख नियन्त्रक के रूप में उपयोग में लाया जाता है । जैसा कि यह बहुत अधिक प्रभावी तथा त्वरित अवापात प्रभाव उत्पन्न करने वाले होते है तथा ये बड़ी से बड़ी नाशक कीट समष्टिको न्यूनतम स्तर तक करने में सफल रहे । इन्हें आवश्यकतानुसार कभी भी उपयोग में लिया जा सकता है । कीटनाशियों का प्रयोग केवल समय विरोध या आपातकाल में ही करते है । कीटनाशी जैविक रूप से सक्रिय रसायन है । फसल सुरक्षा कार्यक्रम में यह नियन्त्रण विधि आसान , सपाल , सस्ती एवं स्वरित परिणाम देने का कारण अधिक प्रचलन में है । इनका प्रयोग आर्थिक रूप से भी लाभदायका है । कीट नियंत्रण में कीटनाशियों का प्रयोग बहुत पुराना है । गन्धक का बतौर कीटनाशी ईसा से 100 वर्ष पहले उपयोग किया गया , जबकि आर्सेनिक का कीटनाशी के रूप में प्रयोग 40 ए . डी . से ही कर रहे है । जर्मनी में दितीय विश्वयुद्ध के दौरान सन् 1939 में डी . डी . टी . की खोज संश्लेषित कीटनाशियों के विकास में बहुत बड़ी क्रान्ति आई और तब से लेकर अब तक कई प्रकार के कीटनाशियों की खोज तथा उनका विकास किया जा चुका है ।

कीटनाशी संरूपण – कीटनाशियों को उनकी शत प्रतिशत अवस्था में कभी भी उपयोग में नहीं लिया जाता । अतः इन्हें सुगमता से प्रयोग में लाने हेतु को संरूपणों में रूपान्तरित कर लिया जाता है तथा किसी भी कीटनाशी के सफल प्रयोग के लिये उपयुक्त संरूपण जरूरी होता है । कीटनाशियों में दो प्रकार के संरूपण दोश तथा दय रूप में उपलब्ध हैं जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है ठोस संरूपण – ये तीन प्रकार के होते हैं |

( अ ) कीटनाशीय धूलि – यह संरूपण बाजार में तैयार रूप से मिलता है जिसमें कीटनाशी की सांद्रता 0.1 से लेकर 25 प्रतिशत तक हो सकती है , परन्तु सामान्यतया 25 एवं 10 प्रतिशत चूर्ण के रूप में उपलब्ध होती है । इसको ज्यों का त्यों बिना कुछ मिलाये 20 – 25 कि . ग्रा . प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करते हैं । इसका प्रातःकालीन उपयोग बहुत लाभकारी पाया गया है ।

( आ ) दानेदार कीटनाशी – इस संरूपण को कीटनाशी निहित असक्रिय पदार्थी से प्राप्त किया जाता है । ये दाने 0.25 से 2.38 मि.मी. परिधि के होते हैं । इन दानों में 2 से 10 प्रतिशत तक कीटनाशी की मात्रा हो सकती है । इनको भूमि अथवा पौधों पर छितराकर प्रयोग में लाते हैं । इस हेतु पानी की आवश्यकता नहीं पड़ती । अनेक प्रकार के नाशीकीटों के नियंत्रण के लिये इन दानों का प्रयोग किया जा रहा है । उदाहरणार्थ मक्का एवं ज्वार के तना वेधक तथा फसल की बुआई से पूर्व इनसे भूमि उपचार करने पर ज्वार तथा गेहूँ की प्ररोह मक्खी का नियन्त्रण सफलतापर्वक किया जा रहा है ।

( इ ) घुलनशील चूर्ण – लगभग सभी कार्बनिक कीटनाशी जल में अघुलनशील होते है जब इनको जल में घोला जाता है तो शीघ्र ही यह पैदे पर बैठने लगते । इसलिये इसे लगातार हिलाना पड़ता है । इस समस्या के निवारण हेतु इसमें एक आर्द्रक को साथ में मिलाते हैं जो कि इनके कणों को पानी में लटकाए रखता है । प्रकार इनका हमेशा अपादरर्शक , लटका हुआ घोल बनता है , जिसे बार – बार हिला की जरूरत नहीं होती । इसे घुलनशील चूर्ण कहते हैं । सामान्यतया इस सनरूपण में 25 , 40 या 50 प्रतिशत कीटनाशी की मात्रा उपस्थित रहती है । इनकी क्रियशिलता 1 या 2 प्रतिशत पृष्ठ सक्रिय भिगोने वाले अथवा विस्थापित करने वाले कारण मिलाकर बढ़ायी जा सकती है ।

अतः किसान भाईयो रायायन का उपयोग कम से कम करे तथा अत्यधिक आवश्कता होने पर ही करे ।

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