Thursday, May 28, 2020
नेपियर घास /हाथी घास उत्पादन तकनीक एवं प्रबन्धन

नेपियर घास /हाथी घास

नेपियर घास एक बहुवर्षीय चारे की फसल है । इसके पौधे गन्ने कीभाती लम्बाई में बढ़ते हैं जिनसे 40 – 50 तक कल्ले निकलते हैं । इसे हाथी घास के नाम से भीजाना जाता है । संकर नेपियर घास के चारे में 2.5 से 6 प्रतिशत तक ऑक्सलेट पाया जाता है जिसके कारण इसको अकेले अधिक दिनों तक खिलाने से पशुओं के शरीर में कैल्शियम ( चूने ) की कमी हो जाती है । इसके बचाव के लिए पशुओं कोनेपियर के साथ रिजका , बरसीम या अन्य चारे अवादाने एवं खलीदेनी चाहिए । बहुवर्षीय फसल होने के कारण इसकी खेती शरद , ग्रीष्म व वर्षा ऋतु में भी की जा सकती है । इसलिए जब अन्य हरे चारे उपलब्धनही होते , उस समयनेपियर का महत्व अधिक बढ़ जाता है । इसकेचारे से साइलेज भी तैयार किया जा सकता है । जलवायु एवं भूमि गर्म व नम जलवायु वाले स्थान जहाँ तापमान अधिक रहता है ( 25 28 सेल्सियस ) , वर्षा अधिक होती है ( 1000 मी मी . ) तथा वायुमण्डल में आर्द्रता भी अधिक रहती हो वो क्षेत्र नेपियर की खेती के लिए उत्तम माने जाते है । कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है । अधिक ठण्डी जलवायु में फसल की वृद्धि नहीं हो पाती है । पालानेपियर के लिए हानिकारक होता है । यह पास कई प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है । मटियार दोमट मिट्टी जिसमें प्रचुरजीवांश पदार्थ उपस्थित हो इसके लिए सर्वोत्तम होती है मृदाकापी . एव मान 6.5 से 8 होना चाहिए |

उन्नत किस्मे

1 . पूसा जायन्ट नेपियर यह किरम भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान , नई दिल्ली से नेपियर एवं बाजरा के संकरण द्वारा विकसित की गई है । उत्तम गुणों वाली यह संकर किस्म अन्य देशी किरमी से दोगुणा हरा चारा उत्पादित करती है । इसमें साधारण नेपियर की अपेक्षा 25 प्रतिशत प्रोटीन तथा 132 प्रतिशत शर्करा अधिक होती है । इसका चारा मुलायम तथा पतीदार होता है । इसमें सुखासहन करने की क्षमता भी होती है ।

2 . नेपियर बाजरा हाईब्रिड 21 ( एन . बी . – 21 ) : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय , लुधियान से विकसित यह किस्म शीघ्र बढ़ने वाली होती है । इसके पौधे लम्बे , तने पतले एवं रॉयें रहित होते हैं । पत्तियाँ लम्बी , पतली तथा चिकनी होती है । पौधे में कल्ले अधिक संख्या में निकलते हैं । इसकी पहली कटाई बुवाई के 50 – 60 दिन बाद की जा सकती हैं । इसके बाद 35 – 40 दिन के अन्तर पर कटाईयाँ ली जा सकती । यह किस्म एक वर्ष में 1500 से 1800 क्विटल चारा प्रति हैक्टेयर उत्पादनदेसकती हैं । नेपियर घासको लगाने के लिए खेत की तैयारी । नेपियर घासलगाने से पूर्वखेत की अच्छी तैयारी करनी चाहिए । एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से या डिस्कप्लाऊ से तथा 2 उजुताझ्या हैरो या देशी हल से करके पाटे द्वारा भूमि को समतल कर लेना चाहिए । अन्तिम जुताई से पूर्व सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट को खेत में बिखेर कर मिलादेना चाहिए ।बीज की मात्रा – नेपियर घास की बुवाई वानस्पतिक भागों द्वारा की जाती हैं । बुवाई हेतु भूमिगत तथा जिन्हें राइजोम कहते हैं को उपयोग में लिया जाता हैं । तने के 2 – 3 गांठवाले टुकड़ो तथा जडाद्वारा भी इसे उगाया जा सकता है । राइजोम की मात्रा या भार उनके लगाने की दूरी पर निर्भर करता हैं । यदि लाइन से लाइन की दूरी दो मीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 30 सेमी . रखते है तो प्रतिहैक्टेयर 16500 – 17000 राइजोम या तनें के टुकड़ो की आवश्यकता पड़ती है जिनका वजन 12 – 13 क्विटल होता है । यदि लाइन से लाइन की दूरी एक मीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 30 सेमी . रखते है तो 32000 – 33000 कल्लों ( राइजोम ) की आवश्यकता होती है जिनका वजन 24 – 25 क्विटल होता है । स्वादव उर्वरक खेत की तैयारी के समय प्रति हैक्टेयर 15 – 20 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट को खेत में डालकर अन्तिम जुताई करनी चाहिए । बुवाई के समय 50 – 60 किलो नाइट्रोजन , 80 – 100 किलो फास्फोरस व 25 – 30 किलो पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से डालना चाहिए ताकि फसल की वृद्धि शीघ्र हो एवं अधिक उत्पादन प्राप्त हो सके । बुवाई से पूर्व मिट्टी की जांच करवाकर सिफारिस के अनुसार उर्वरक देना अधिक लाभदायकरहता है । रोपाईका समयव विधि जहाँ सिंचाई की सुविधा नहीं हो वहाँ बुवाईजुलाई – अगस्त में करें । नेपियर को लगाने का सर्वोत्तम समय मार्च माह माना जाता है । अधिक गर्मी एवं अधिक सर्दी में पौधे ठीक तरह से स्थापित नहीं हो पाते है । जड्युक्त टुकड़ों द्वारा रोपाई करने हेतु पूरे पौधों को जमीन से खोदकर बाहर निकाल दिया जाता है फिर 15 – 20 सेमी . लम्बे नये राइजोमको जड़ सहित अलग कर लिया जाता है । यदि टुकड़े बड़े हों तो उसकी पत्तियों काट देनी चाहिए , जिससे उत्स्वेदन द्वारापानी की क्षति कम होगी । बुवाई हमेशा लाईनों में मेड़ो पर करनी चाहिए । उपर्युक्त दूरी पर लाइन बनाकर 2 – 3 गांठ वाले टुकड़ो को भूमि में 45 डिग्री के कोण पर इस प्रकार लगाएँ किटुकड़े की एक गांठजमीन के अन्दर व दूसरी जमीन से उपर हरे । टुकड़ो का झुकाव ठीक उसी प्रकार की जाती है जैसे गन्ने की बुवाई की जाती है । बुवाई के तुरन्त बाद सिंचाई अवश्यकरनी चाहिए ।

सिचाई प्रबंधन

नेपियर घास की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए यह जरूरी है कि खेत में पर्याप्त नमी बनी रहनी चाहिए । सर्दियों में पाले से बचाव के लिए तथा गर्मियों में सूखे से बचाव के लिए प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई अवश्य करनी चाहिए । हल्की भूमि में भारी भूमि की अपेक्षा अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती लेकिन जल निकास । की सुविधा जरुर होनी चाहिए । निराई – गुहाई एवं खरपतवार प्रबंधन प्रत्येक कटाई के बाद कतारों के बीच में गुडाई करनी चाहिए , इससे वायु संचार बढ़ता है तथा भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ती है जिससे फसल की बढ़वार अधिक होती है । फसल लगाने के 2 – 3 माह तक खरपतवार अधिक होते है अतः निराई – गुडाई कर इन्हे नियंत्रित करना चाहिए । वर्ष में दो बार ( वर्षा प्रारम्भ होने से पूर्व एवं सर्दियों के अन्त में ) लाइनों के बीच जुताई करनी चाहिए । कीट एवं रोग प्रबंधन चूंकि नेपियर घास एक चारे की फसल है , अतः इसकी बार – बार कटाई किए जाने के कारण कीट एवं बीमारियों का प्रकोप नहीं होता है । यदि भूमि में दीमक की समस्या हो तो सिंचाई के पानी के साथ क्लोरोपाइरीफॉस 2 ली . प्रति हैक्टेयर की दर से देना चाहिए । यदि वर्षा ऋतु में फड़का की समस्या हो तो विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार मिथाईल पैराथियोन का उपयोग किया जा सकता है , लेकिन छिड़काव के एक माह तक चारा पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए ।कटाई उपज प्रबंधन नेपियर घास की पहली कटाई बुवाई के 70 – 80 दिन बाद करनी चाहिए । इसके बाद 35 – 40 दिन के अन्तराल पर कटाई करते रहना चाहिए । इस प्रकार कटाई करने से हर कटाई पर 1 – 1 . 5 मी . लम्बाई की फसल मिलती रहती है । अधिक समय तक कटाई नहीं करने पर इसके तने सख्त हो जाते हैं और उसमें रेशे की मात्रा बढ़ जाती है जिसके कारण पशु इसे कम खाना पसन्द करते है । साथ ही चारे की पाचनशीलता कम हो जाने के कारण पशुओं का दूध उत्पादन कम हो जाता है । सर्दियों में ( नवम्बर से फरवरी ) पौधों की वृद्धि रुक जाती है और चारे का उत्पादन नहीं मिल पाता है । वर्ष भर में नेपियर से 5 – 6 कटाई ली जा सकती है जिससे 15 – 20 प्रतिशत शुष्क पदार्थ होता है । इसके चारे में 7 – 12 प्रतिशत प्रोटीन होता है व इसकी पाचनशीलता 50 – 70 प्रतिशत होती है ।

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3 Comments

GANGADHAR melavanki May 17, 2020 at 4:38 pm

Supar product

    SrEnterprices May 17, 2020 at 6:14 pm

    Thank you sir
    we are happy to help

    SrEnterprices May 19, 2020 at 8:13 pm

    thank you sir

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