Thursday, August 6, 2020
सौंफ की खेती कैसे करे

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किसान भाइयों आज हम आपको बताएँगे कि आप सौंफ की खेती किस प्रकार कर सकते हो |

सौंफ की खेती कैसे करे

सौंफ की खेती कैसे करे

सौंफ मसाले की एक प्रमुख फसल है । इसका उपयोग औषधि के रूप में  किया जाता है । भारतवर्ष में सौंफ की खेती मुख्यत : राजस्थान , गुजरात तथा उत्तरप्रदेश में होती है ।

उन्नत किस्में कम आर . एफ . 125 ( 2006 ) :

इस किस्म के पौधे कम ऊँचाई के होते हैं । जिसका पुष्पक्रम सघन तथा लम्बे , सुडौल एवं आकर्षक दानोंयुक्त होता है । यह किस्म शीघ्र पकने वाली है । इसकी औसत उपज 17 क्विटल प्रति हैक्टेयर है ।

आर . एफ . 143 ( 2007 ) :

इस किस्म के पौधे सीधे एवं ऊँचाई 116 118 से . मी . होती है । जिस पर 7 – 8 शाखाएँ निकली हुई होती हैं । इसका पुष्पक्रम सघन होता है तथा प्रति पौधा अम्बल की संख्या 23 – 62 होती है । यह किस्म 140 150 दिनों में पककर तैयार हो जाती है । इसकी औसत उपज 18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है । इसमें वाष्पशील तेल अधिक ( 1 . 87 प्रतिशत ) होता है ।

आर . एफ . 101 ( 2005 ) :

यह किस्म दोमट एवं काली कपास वाली भूमियों के लिये उपयुक्त है । यह 150 – 160 दिन में पक जाती है । पौधे सीधे व मध्यम ऊँचाई वाले होते हैं । इसकी औसत उपज क्षमता 15 – 18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है । इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा भी अधिक ( 1 . 2 प्रतिशत ) होती है । इस किस्म में रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता अधिक तथा तेला कीट कम लगता है ।

जलवायु :

जलवायु एवं सामान्य ठण्डामा गुणवत्ता के लिये बहुत यह शरद ऋत में बोयी जाने वाली फसल है । लेकिन सौंफ फल आने के व पाले से प्रभावित होती है , इसलिए इसका विशेष ध्यान रखना चाहिये । शुष्क अन्य ठण्डा मौसम विशेषकर माह जनवरी से माह मार्च तक इसकी उपज व के लिये बहुत लाभदायक रहता है । फूल आते समय , लम्बे समय तक ‘ बादल या अधिक नमी से बीमारियों के प्रकोप को बढ़ावा मिलता है।

भूमि एवं खेत की तैयारी :

सौंफ की खेती बलुई मिट्टी को छोड़कर प्रायः सभी प्रकार की भूमि जिसमें जीवांश पर्याप्त मात्रा में हो , की जा सकती है । लेकिन अच्छी पैदावार लिए जल निकास की पर्याप्त सुविधा वाली , चूनायुक्त , दोमट व काली मिट्टी उपयासी होती है । भारी एवं चिकनी मिट्टी की अपेक्षा दोमट मिट्टी अधिक अच्छी रहती है अच्छी तरह से जुताई करके 15 से 20 सेन्टीमीटर गहराई तक खेत की मिट्टी को जुताई करके भुरभुरी बना लेना चाहिये । खेत की तैयारी के समय पर्याप नमी न हो तो पलेवा देकर खेत की तैयारी करनी चाहिये । जुताई के बाद पाट चलाकर खेत को समतल करके सिंचाई की सुविधानुसार क्यारियाँ बनानी चाहिये|

खाद व उर्वरक :

फसल की अच्छी बढ़वार के लिए भूमि में पर्याप्त मात्रा में जैविक पदार्थ का होना आवश्यक है । यदि इसकी उपयुक्त मात्रा भूमि में न हो , तो 10 से 15 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हैक्टेयर खेत की तैयारी से पहले डाल देन चाहिये । इसके अतिरिक्त 90 किलो नत्रजन एवं 40 किलो फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से देना चाहिये । 30 किलो नत्रजन एवं फास्फोरस की पूर्ण मात्रा खेत को अन्तिम जुताई के साथ ऊरकर देना चाहिये । शेष नत्रजन को दो भागों में बाँट कर 30 किलो बुवाई के 45 दिन बाद एवं शेष 30 किलो नत्रजन फूल आने के समय फसल की सिंचाई के साथ देवें ।

जैविक पोषक तत्व प्रबन्धन :

सौंफ में जैविक पोषक तत्व प्रबन्धन के लिए शत – प्रतिशत सिफारिश के गई नत्रजन की मात्रा गोबर की खाद द्वारा तथा साथ में जैव उर्वरक ( एजेयेबेक्टर फास्फोरस विलयकारी जीवाणु 5 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर ) 250 किलोग्राम जिप्सम 250 किलोग्राम तुम्बा की खली व सिफारिश की गई नवजन की 50 प्रतिशत मा फसल अवशेष प्रति हैक्टेयर व फसल बचाव के लिए नीम आधारित उत्पा एन्टोमोफेगस फफूंद अथवा बायोपेस्टीसाइड अथवा वानस्पतिक उत्पाद अब गौशाला उत्पाद एवं प्रीडेटर का उपयोग किया जा सकता है ।

बीज की मात्रा एवं बुवाई :

सौंफ के लिए 8 – 10 किलोग्राम स्वस्थ बीज प्रति हैक्टेयर बुवाई । पर्याप्त होता है । बुवाई अधिकतर छिटकयाँ विधि से की जाती है तथा निर्धारित निर्धारित बीच की मात्रा , एकसमान छिटक कर हल्की दंताली चलाकर या हाथ से मिट्टी में मिला उपस । है की पर्याय देव बाईमा लेकिन सौंफ की बुवाई रोपण विधि द्वारा या सीधे कतारों में भी की जाती पवासीधी बुवाई के लिए 8 – 10 किलो बीज एवं रोपण विधि में 3 – 4 किलो बीज की प्रति हैक्टेयर आवश्यकता होती है । पर रोपण विधि से बुवाई के लिए माह जुलाई – अगस्त में 100 वर्गमीटर क्षेत्र में पौध शैया लगाई जाती है तथा माह सितम्बर में रोपण किया जाता है । इसकी शबवाई मध्य सितम्बर से मध्य अक्टूबर तक की जाती है । बुवाई 40 – 50 सेन्टीमीटर के फासले पर कतारों में हल के पीछे कूड़ में 2 – 3 सेन्टीमीटर की गहराई पर करें । पौध को , पौधशाला में सावधानीपूर्वक उठायें , जिससे जड़ों को नुकसान नहीं हो । रोपण दोपहर बाद गर्मी कम होने पर करें तथा रोपण के बाद तुरन्त सिंचाई करें । सीधी बुवाई में बुवाई के 7 – 8 दिन बाद दूसरी हल्की सिंचाई करें , जिससे अंकुरण पूर्ण हो जाये ।

बीजोपच उत्पा बीजोपचार एवं बुवाई का समय :

बुवाई से पूर्व बीज को काइँण्डेजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से प्रतिशतमा उपचारित कर बोयें । इसकी बुवाई का उपयुक्त समय मध्य सितम्बर है ।

सिंचाई :

सौंफ को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है । युवाई के समय खेत में नमी कम हो तो बुवाई के तीन – चार दिन बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिये , जिससे बीज जम जायें । सिंचाई करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि पानी का बहाव तेज न हो अन्यथा बीज बह कर किनारों पर इकट्ठे हो जायेंगे । दूसरी सिंचाई बुवाई के 12 – 15 दिन बाद करनी चाहिये जिससे बीजों का अंकुरण पूर्ण हो जाये । इसके बाद सर्दियों में 15 – 20 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिये । फूल आने के बाद फसल को पानी की कमी नहीं होनी चाहिये ।

निराई – गुड़ाई :

सौंफ के पोधे जब 8- 10 सेन्टोमीटर के हो जाये तब गुडाई करके खरपतवार निकात दे । गुडाई करते समय जहाँ पोेधे अधिक हों , वहाँ से कमजोर पौगों के निकालकर पौधे से पौधे की दूरी 20 सेन्टीमीटर करदें , जिससे बदवार अच्छी हो इसके बाद समय – समय पर आवश्यकतानुसार खरपतवार निकालते हैं । फूल आने के समय पौधों पर हल्की मिट्टी चढ़ा देवें , जिससे कि तेज हवा से पौधे नहीं गिरे। सौंफ में एक किलो पेन्डीमिथेलिन सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर 750 लीटर पानी में पोलकर बुवाई के 1 से 2 दिन बाद छिड़काव करके भी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है।

प्रमुख कीट एवं व्याधियाँ :

मोयला , पर्णजीवी ( थिप्स ) एवं मकड़ी ( वरूथी ) : मोयला के कोमल भाग से रस चूसता है तथा फसल को काफी नुकसान पहुंचाता है । ह थिप्स कीट बहुत छोटे आकार का होता है तथा कोमल एवं नई पत्तियों से हरा प्रद्रार्त खुरच कर खाता है , जिससे पत्तियों पर धब्बे दिखाई देने लगते हैं तथा पते पीले होकर सुख जाते है।

मकड़ी छोटे आकार का कीट है , जो पत्तियों पर घूमता रहता है ।रस चूसता है , जिससे पोधा पीला पड़ जाता है । नियंत्रण हेत डाईमियोएट . 30 ई सी या मैलाथियान 50 ई . सी . एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी या एसीटामाप्रीड20% एस . पी . का 100 ग्राम प्रति हैक्टेयर के हिसाब से घोल बनाकर छिड़कना यदि आवश्यक हो तो यह छिड़कना चाइए 15 – 20 दिन बाद दोहरायें ।

छाड्या ( पाउडरी मिल्लय ) :

रोग के लगने पर शुरू में पतियो व टहनियों पर सफेद चूर्ण दिखाई देता है , जो बाद में चूर्ण पौधे पर फैल जाता नियंत्रण हेतु 20 – 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेया गांधक के चूर्ण का भुरकाव करना चाहिये या डाइनोकेप एल . सी . 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़कना चाहिये । आवश्यकतानुसार 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव दोहरायें ।

जड़व तना गलन :

रोग के प्रकोप से तना नीचे से मुलायम हो जाता है व जड़ गल जाती है । जड़ों पर छोटे – बड़े काले स्कलेरोशिया दिखाई देते हैं । नियंत्रण हेतु बूवाई से पूर्व बीज को कारबेंडजीम 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करनी चाहिये या कैप्टान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से भूमि को उपचारित करना चाहिये ।

कटाई :

सौंफ के दाने गुच्छों में आते हैं । एक ही पौधे के सब गुच्छे एक साथ नहीं पकते हैं । अत : कटाई एक साथ नहीं हो सकती है । जैसे ही दानों का रंग हरे से पीला होने लगे गुच्छों को तोड़ लेना चाहिये । सौंफ की उत्तम पैदावार के लिये फसल को अधिक पककर पीला नहीं पड़ने देना चाहिये सूखते समय बार – बार पलटते रहना चाहिये वरना फर्कंदलगने की सम्भावना रहती है । उत्तम किस्म की चबाने ( खाने ) के रूप में काम आने वाली सौंफ पैदा करने के लिए , जब दानों का आकार पूर्ण विकसित दानों की तुलना में आधा होता है , इस समय छत्रकों की कटाई कर साफ जगह पर छाया में फैलाकर सुखाना चाहिये । इस विधि से कटाई करने से सुप्रसिद्ध लखनऊ – 1 किस्म की सौंफ प्राप्त होती है । बुवाई हेतु बीज प्राप्त करने के लिए मुख्य छनकों के दाने जब पूर्णतया पककर पीले पड़ने लगें , तभी काटना चाहिये ।

उपज :

सौंफ की अच्छी तरह से खेती की जाये तो 10 – 15 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक पूर्ण विकसित एवं हरे दाने वाली सौंफ की उपज प्राप्त की जा सकती है । साधारणतया 5 – 7.5 विवटल प्रति हैक्टेयर महीन किस्म की सौंफ आसानी से पैदा की जा सकती है । दवा छिड़काव के तुरन्त बाद फल – सब्जी न तोड़ें |

। रास्ते में गोबर – कचरे का ढेर नहीं लगावें । ।

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