चावल की खेती के लिएभूमि उपचार :-

मृदा पी.एच. 6-8.51 भूमि उपचार रोगों का प्रकोप अधिक होने पर प्रति हेक्टेयर 100 कि.ग्रा . सड़े गोबर में 10 कि.ग्रा . ट्राइकोडर्मा व सूत्रकृमि की समस्या अधिक होने पर प्रति वर्गमीटर नर्सरी के लिए 3-4 ग्रा कर्बोफ्यूरान 3 जी का प्रयोग करें ।

चावल की मुख्य किस्में:-

-पारंपरिक बासमती चावल। -बासमती 30,31. -पूसा बासमती चावल। –1121 बासमती चावल। -1509 बासमती चावल। -1718 बासमती चावल। -सुगंधा चावल। -शरबती चावल।

चावल/धन का बीज उपचार :-

बीज उपचार 1.5 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लीन + 25 ग्राम घुलनशील पारद फफूंदनाशी पाउडर को 45 लिटर पानी में घोल बनाकर 25 किलो बीज को 12 घंटे तक भिगोएँ एवं डंडे से हिलाते रहें एवं तैरते हुए बीजों को निकाल दें । इसके बाद 40 लिटर पानी में 400 मि.लि. सोडियम हाइपो क्लोराइड घोलकर 25 कि.ग्रा . बीजों को 12 घंटे तक भिगोकर बीजाई करें । इससे अंकुरण में वृद्धि होती है , पौधों की शीघ्र बढ़वार होती है एवं बीजजनित बीमारियों की रोकथाम होती है।

चावल/धन का बुवाई समय:-

बिजाई समय – 15 मई से जून – जुलाई । बीज की मात्रा  प्रति हेक्टेयर नर्सरी : मोटे दानों वाली किस्मों के लिए : 40-50 कि.ग्रा . , पतले दानों वाली किस्मों के लिए : 30-35 कि.ग्रा . , श्री पद्धति में : प्रति हेक्टेयर 6-8 कि.ग्रा . बीज की मात्रा या 6-8 ग्राम / वर्गमीटर बीज की रोपणी डालने हेतु आवश्यकता होगी । श्री पद्धति में संकर धान 15 कि.ग्रा . प्रति हेक्टेयर उगाने से अधिक फायदा होता है । सीधी बुवाई करने पर बलुई . दोमट भूमि में अंकुरित बीजों की बुवाई लाभप्रद मानी जाता है । पौधरोपण बीजाई के 20-30 दिन बाद चार पत्ति अवस्था पर , पौधरोपण की गहराई 2.5-3 से.मी .। नर्सरी से पौध उखाड़ने से एक दिन पूर्व पानी लगा देना चाहिए ।

श्री पद्धति से चावल की खेती:-

श्री पद्धति श्री पद्धति ( S.R.I – System of Rice Intensification ) चावल उगाने की यह ऐसी पद्धति है जिसमें मृदा उत्पादकता , जल उपयोग क्षमता , श्रम शक्ति एवं निवेशित पूँजी की दक्षता को एक साथ बढ़ाकर पर्यावरण को संरक्षित रखते हुए अधिक पैदावार प्राप्त की जा सकती है । इस पद्धति का विकास मेडागास्कर देश के एक आश्रम के पुजारी द्वारा किया गया । उस आश्रम की जमीन रेतीली थी जिसमें चावल की उपज 2-3 टन प्रति हेक्टेयर होती थी । इस पद्धति के विकास के बाद वही उपज 8-12 टन प्रति हेक्टेयर हो गई । इस विधि में पौधों की रोपाई के बाद मिट्टी को केवल नम रखा जाता है । खेत में पानी को खड़ा हुआ नहीं रखते हैं जिससे मृदा वायवीय दशाओं में रहती है और मृदा में विनाइट्रीकरण की क्रिया द्वारा नाइट्रोजन के हास को रोका जा सकता है । परिणामस्वरूप उर्वरकों की बचत तो होती ही है , साथ ही ग्रीन हाउस गैसों ( नाइट्रस आक्साइड व मीथेन ) का उत्सर्जन भी नगण्य के बराबर होता है । इस पद्धति में कम्पोस्ट , जैविक या हरी खाद का उपयोग आवश्यक है । श्री पद्धति अपनाने के लिए निचले क्षेत्र जहाँ जल – भराव की संभावना रहती हों या ऊसरीली भूमि का चयन न करें । इस विधि में पारंपरिक पद्धति से भिन्न उद्यानिकी नर्सरी की भांति रोपणी डाली जाती है । रोपणी हेतु चुने हुए खेत की 2-3 बार जुताई कर बखर चलाकर मिट्टी को भुरभुरी बनाने के बाद 1 मीटर चौड़ी , 10 मीटर लम्बी एवं भू – सतह से 15 सेमी ऊँची उठी क्यारी बनावें । इसके दोनों ओर सिंचाई नाला बनाना आवश्यक है । इस प्रकार एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 10 x 1 मीटर की 100 उठी हुई रोपणी क्यारियों की आवश्यकता होगी । नर्सरी इस प्रकार तैयार करें : पहली परत में 1 इंच तक सड़ी गोबर / कम्पोस्ट खाद दें । दूसरी परत में 1.5 इंच तक खेत की भुरभुरी मिट्टी दें । तीसरी परत में 1 इंच तक सड़ी गोबर / कम्पोस्ट खाद दें । चौथी परत में 2.5 इंच तक खेत की भुरभुरी मिट्टी दें । सभी परतों को ठीक से मिलाकर भुरभुरा बना लें । एक हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए 1000 वर्गफुट की नर्सरी पर्याप्त होगी । नर्सरी में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग न करें ।

श्री पद्धति में 8-12 दिन की पौध लगायी जाती है । नर्सरी से पौध निकालने के बाद जड़ों को साफ पानी से धोकर आधे घंटे के अंदर रोपाई कर देनी चाहिए जिससे इनकी जड़ों को सूखने से बचाया जा सके । रोपणी के बाद धान के पुआल से 48 घण्टे के लिए क्यारी को ढक देना चाहिए , उसके बाद पुआल हटा दें एवं पानी आवश्यकतानुसार छिड़काव द्वारा दें तो लाभप्रद होगा । पौधों में दूरी 10 से.मी. , श्री पद्धति में -25-30 से.मी .। लाइनों में दूरी 20 से.मी. , श्री पद्धति में – 25-30 से.मी .। फसल चक्र असिंचित क्षेत्र : चावल – चना , चावल – मसूर , चावल – मटर ।

चावल/धान की खेती के लिए आवशयक सूक्ष्म पोषक तत्व:-

सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता कम मात्रा में होती है, लेकिन वे पौधों के पोषण में प्रमुख तत्वों के रूप में महत्वपूर्ण हैं। चावल के लिए सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व नाइट्रोजन, चावल की उत्पादकता को सार्वभौमिक रूप से सीमित कर रहा है।

चावल की फसल में आने वाले प्रमुख रोग:-

चावल के तीन विषाणु रोग, अर्थात् पीला बौना, नारंगी पत्ती और घास का स्टंट, उनके लक्षणों, वेक्टर संचरण और वायरस-वेक्टर संबंधों के आधार पर विशेषता है। पीला बौना वायरस नेफोटेटिक्स निग्रोपिक्टस (स्टाल) (एप्लिकलिस ऑक्ट) द्वारा प्रेषित होता है।

पीला बौना वायरस:-

पीला बौना वायरस रोकथाम :- यह वायरस अफिड्स के कारण फैलता है । इन कष्टप्रद कीटों को हटाने के लिए पत्तियों पर ठंडे पानी का छिड़काव करें। पौधों को आटे से धूल दें क्योंकि यह कीटों को कब्ज करता है और तेजी से प्रजनन को रोकता है। पौधे को स्प्रे करने के लिए कीटनाशक साबुन या बागवानी तेल का प्रयोग करें ।

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